🚀 संपूर्ण जैव प्रक्रम (Life Processes): बोर्ड परीक्षा का 🎯 TOP स्कोरिंग गाइड!
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1. जैव प्रक्रम क्या है? (What are जैव प्रक्रम)
जीवों का अनुरक्षण कार्य निरंतर होना चाहिए। वे सभी प्रक्रम जो सम्मिलित रूप से अनुरक्षण का कार्य करते हैं, जैव प्रक्रम कहलाते हैं। अनुरक्षण के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होगी। यह ऊर्जा एकल जीव के शरीर के बाहर से आती है।
2. पोषण: ऊर्जा का आरंभ (Nutrition: The Start of Energy)
2.1. 🌱 स्वपोषी पोषण और प्रकाश संश्लेषण
स्वपोषी जीव अकार्बनिक स्रोतों से कार्बन डाइऑक्साइड तथा जल के रूप में सरल पदार्थ प्राप्त करते हैं। स्वपोषी जीव की कार्बन तथा ऊर्जा की आवश्यकताएँ प्रकाश संश्लेषण द्वारा पूरी होती हैं।
- क्लोरोफिल द्वारा प्रकाश ऊर्जा को अवशोषित करना।
- प्रकाश ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा में रूपांतरित करना तथा जल अणुओं का हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में अपघटन।
- कार्बन डाइऑक्साइड का कार्बोहाइड्रेट में अपचयन।
- ये हरे बिंदु वाले कोशिकांग हैं जिन्हें क्लोरोप्लास्ट कहते हैं, जिनमें क्लोरोफिल होता है।
- पत्ती की सतह पर सूक्ष्म छिद्र होते हैं, जिन्हें रंध्र (Stomata) कहते हैं, जिनसे गैसों का अधिकांश आदान-प्रदान होता है। द्वार कोशिकाओं में जब जल अंदर जाता है तो वे फूल जाती हैं और रंध्र का छिद्र खुल जाता है।
- जो कार्बोहाइड्रेट तुरंत प्रयुक्त नहीं होते हैं, उन्हें मंड (Starch) के रूप में संचित कर लिया जाता है।
2.2. 🍔 विषमपोषी पोषण और मानव पाचन तंत्र
विषमपोषी उत्तरजीविता के लिए प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से स्वपोषी पर आश्रित होते हैं। मानव पाचन तंत्र आहार नाल के भीतर इस जटिल प्रक्रिया को पूरा करता है, जो मूल रूप से मुँह से गुदा तक विस्तरित एक लंबी नली है।
- मुँह: लार में एक एंजाइम होता है, जिसे लार एमिलेस कहते हैं। यह मंड जटिल अणु को सरल शर्करा में खंडित कर देता है।
- आमाशय: जठर ग्रंथियाँ हाइड्रोक्लोरिक अम्ल (HCl), एक प्रोटीन पाचक एंजाइम पेप्सिन तथा श्लेष्मा का स्रावण करते हैं। HCl अम्लीय माध्यम तैयार करता है, जो पेप्सिन एंजाइम की क्रिया में सहायक होता है।
- क्षुद्रांत्र (Small Intestine): यह कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन तथा वसा के पूर्ण पाचन का स्थल है। यकृत से स्रावित पित्तरस वसा का इमल्सीकरण करता है। अग्न्याशयिक रस में प्रोटीन के पाचन के लिए ट्रिप्सिन तथा वसा के लिए लाइपेज एंजाइम होता है।
- अवशोषण: पाचित भोजन को आंत्र की भित्ति अवशोषित कर लेती है। क्षुद्रांत्र के आंतरिक आस्तर पर अनेक अँगुली जैसे प्रवर्ध होते हैं, जिन्हें दीर्घरोम (Villi) कहते हैं। ये अवशोषण का सतही क्षेत्रफल बढ़ा देते हैं।
3. श्वसन: ऊर्जा का निष्कासन (Respiration: Releasing Energy)
खाद्य पदार्थों का उपयोग कोशिकाएँ विभिन्न जैव प्रक्रम के लिए ऊर्जा प्रदान करने के लिए करती हैं।
3.1. वायवीय श्वसन (Aerobic Respiration)
पहला चरण ग्लूकोज़ (एक छः कार्बन वाले अणु) का तीन कार्बन वाले अणु पायरूवेट में विखंडन है। यह प्रक्रम कोशिकाद्रव्य में होता है।
- वायवीय श्वसन: पायरुवेट का विखंडन ऑक्सीजन का उपयोग करके माइटोकॉन्ड्रिया में होता है। यह प्रक्रम वायु (O2) की उपस्थिति में होता है। वायवीय श्वसन में ऊर्जा का मोचन अवायवीय श्वसन की अपेक्षा बहुत अधिक होता है।
- अवायवीय श्वसन: यह प्रक्रम वायु (O2) की अनुपस्थिति में होता है। पायरुवेट इथेनॉल तथा CO2 में परिवर्तित हो सकता है (यीस्ट में)।
- ऑक्सीजन का अभाव: जब हमारी पेशी कोशिकाओं में O2 का अभाव हो जाता है, तो पायरुवेट लैक्टिक अम्ल में परिवर्तित हो जाता है।
3.2. गैसों का विनिमय और कूपिकाएँ
मनुष्य में, वायु शरीर के अंदर नासाद्वार द्वारा जाती है। यहाँ से वायु कंठ द्वारा फुफ्फुस में प्रवाहित होती है। कंठ में उपास्थि के वलय उपस्थित होते हैं, जो सुनिश्चित करते हैं कि वायु मार्ग निपतित न हो।
- कूपिका (Alveoli): फुफ्फुस के अंदर मार्ग छोटी नलिकाओं में विभाजित हो जाता है, जो अंत में गुब्बारे जैसी रचना कूपिका में अंतकृत हो जाता है। कूपिका एक सतह उपलब्ध कराती है, जिससे गैसों का विनिमय हो सकता है।
- हीमोग्लोबिन: मानव में श्वसन वर्णक हीमोग्लोबिन है, जो O2 के लिए उच्च बंधुता रखता है। यह वर्णक लाल रुधिर कणिकाओं में उपस्थित होता है।
4. वहन: परिवहन की दक्षता (Transportation: Efficiency)
4.1. ❤️ मानव में दोहरा परिसंचरण (Double Circulation)
रुधिर भोजन, ऑक्सीजन तथा वर्ज्य पदार्थों का हमारे शरीर में वहन करता है। हृदय एक पेशीय अंग है, जो रुधिर को अंगों के आस-पास धकेल सके।
- हृदय का दायाँ व बायाँ बँटवारा ऑक्सीजनित तथा विऑक्सीजनित रुधिर को मिलने से रोकने में लाभदायक होता है।
- रुधिर एक चक्र में दो बार हृदय में जाता है। इसे दोहरा परिसंचरण कहते हैं।
- निलय की पेशीय भित्ति मोटी होती है, क्योंकि निलय को पूरे शरीर में रुधिर भेजना होता है।
- धमनी: रुधिर को हृदय से उच्च दाब पर शरीर के विभिन्न अंगों तक ले जाती हैं।
- शिराएँ: विभिन्न अंगों से रुधिर एकत्र करके वापस हृदय में लाती हैं। उनमें रुधिर को एक ही दिशा में प्रवाहित करने के लिए वाल्व होते हैं।
- प्लेटलैट्स: ये कोशिकाएँ पूरे शरीर में भ्रमण करती हैं और रक्तस्राव के स्थान पर रुधिर का थक्का बनाकर मार्ग अवरुद्ध कर देती हैं।
4.2. 🌳 पादपों में वहन (Transportation in Plants)
पादप वहन तंत्र पत्तियों से भंडारित ऊर्जा युक्त पदार्थ तथा जड़ों से कच्ची सामग्री का वहन करेगा।
- जाइलम (Xylem): यह मृदा से प्राप्त जल और खनिज लवणों को वहन करता है। पादप के वायवीय भागों द्वारा वाष्प के रूप में जल की हानि वाष्पोत्सर्जन कहलाती है। वाष्पोत्सर्जन कर्षण (Suction) जल को जड़ों में उपस्थित जाइलम कोशिकाओं द्वारा खींचता है।
- फ्लोएम (Phloem): यह प्रकाश संश्लेषण के उत्पादों का स्थानांतरण (Translocation) करता है। फ्लोएम द्वारा स्थानांतरण ऊर्जा (ATP) के उपयोग से पूरा होता है। यह उपरिमुखी तथा अधोमुखी दोनों दिशाओं में होता है।
5. उत्सर्जन: विषैले पदार्थों से मुक्ति (Excretion: Clearing Waste)
वह जैव प्रक्रम, जिसमें इन हानिकारक उपापचयी वर्ज्य पदार्थों का निष्कासन होता है, उत्सर्जन कहलाता है।
5.1. 💧 वृक्काणु (Nephron): वृक्क की छन्नी
मानव के उत्सर्जन तंत्र में एक जोड़ा वृक्क होता है। वृक्क में मूत्र बनने का उद्देश्य रुधिर में से वर्ज्य पदार्थों को छानकर बाहर करना है।
- वृक्काणु (Nephron): वृक्क में ऐसे अनेक निस्यंदन एकक होते हैं, जिन्हें वृक्काणु कहते हैं।
- कार्यविधि: प्रारंभिक निस्यंद में कुछ पदार्थ, जैसे- ग्लूकोज़, अमीनो अम्ल, लवण और प्रचुर मात्रा में जल रह जाते हैं। जैसे-जैसे मूत्र इस नलिका में प्रवाहित होता है इन पदार्थों का चयनित पुनरवशोषण हो जाता है।
- मूत्र मूत्राशय में भंडारित रहता है, और इसकी निकासी को तंत्रिका नियंत्रण द्वारा नियंत्रित किया जाता है।
5.2. 🌳 पादपों में उत्सर्जन
पादप उत्सर्जन के लिए जंतुओं से बिल्कुल भिन्न युक्तियाँ प्रयुक्त करते हैं।
- वे अतिरिक्त जल से वाष्पोत्सर्जन द्वारा छुटकारा पा सकते हैं।
- बहुत से पादप अपशिष्ट उत्पाद कोशिकीय रिक्तिका में संचित रहते हैं।
- अन्य अपशिष्ट उत्पाद रेजिन तथा गोंद के रूप में विशेष रूप से पुराने जाइलम में संचित रहते हैं।
- पादप भी कुछ अपशिष्ट पदार्थों को अपने आस-पास की मृदा में उत्सर्जित करते हैं।

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