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20.12.25

Life Processes Class 10 Important Questions | जैव प्रक्रम के महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर (Subjective Q&A)

जैव प्रक्रम - प्रश्नोत्तर

जैव प्रक्रम अध्याय: 60 प्रश्नोत्तर

कक्षा 10 विज्ञान | अध्याय 5

पाठ परिचय

यह अध्याय जीवों में होने वाले विभिन्न जैविक प्रक्रियाओं के बारे में है जो उनके जीवन के अनुरक्षण के लिए आवश्यक हैं। इसमें पोषण, श्वसन, परिवहन, उत्सर्जन आदि प्रक्रियाओं का विस्तार से अध्ययन किया गया है। यहाँ अध्याय के सभी महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर दिए गए हैं जो परीक्षा की तैयारी में सहायक होंगे।

Class 10 Science Chapter 5 Life Processes (जैव प्रक्रम) Most Important MCQ and Objective Questions for Board Exam thumbnail
1. हमारे जैसे बहुकोशिकीय जीवों में अॉक्सीजन की आवश्यकता पूरी करने में विसरण क्यों अपर्याप्त है?
बहुकोशिकीय जीवों में शरीर का आकार बड़ा होता है और सभी कोशिकाएँ सीधे पर्यावरण के संपर्क में नहीं होती हैं। विसरण धीमी प्रक्रिया है और केवल छोटी दूरी तक ही कारगर होती है। इसलिए, शरीर के सभी भागों तक पर्याप्त मात्रा में अॉक्सीजन पहुँचाने के लिए विसरण पर्याप्त नहीं है। इसके लिए एक विशेष परिवहन तंत्र की आवश्यकता होती है।
2. कोई वस्तु सजीव है, इसका निर्धारण करने के लिए हम किस मापदंड का उपयोग करेंगे?
किसी वस्तु के सजीव होने का निर्धारण करने के लिए हम उसमें जैव प्रक्रमों की उपस्थिति को मापदंड मानते हैं। ये प्रक्रम हैं: पोषण, श्वसन, उत्सर्जन, संवेदनशीलता, वृद्धि, प्रजनन और अनुकूलन। केवल बाहरी गति को देखकर सजीव का निर्धारण नहीं किया जा सकता क्योंकि आणविक स्तर पर होने वाली गतियाँ भी जीवन के लिए आवश्यक हैं।
3. किसी जीव द्वारा किन कच्ची सामग्रियों का उपयोग किया जाता है?
जीव अपने पोषण और वृद्धि के लिए विभिन्न कच्ची सामग्रियों का उपयोग करते हैं। स्वपोषी जीव कार्बन डाइअॉक्साइड, जल, सूर्य के प्रकाश और खनिज लवणों का उपयोग करते हैं। विषमपोषी जीव अन्य जीवों द्वारा तैयार किए गए जटिल कार्बनिक पदार्थों का उपयोग करते हैं। मनुष्य जैसे जीव कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा, विटामिन, खनिज लवण और जल का उपयोग करते हैं।
4. जीवन के अनुरक्षण के लिए आप किन प्रक्रमों को आवश्यक मानेंगे?
जीवन के अनुरक्षण के लिए निम्नलिखित प्रक्रम आवश्यक हैं: पोषण (ऊर्जा और पदार्थों की प्राप्ति), श्वसन (ऊर्जा मुक्त करने की प्रक्रिया), परिवहन (पदार्थों का शरीर में वितरण), उत्सर्जन (हानिकारक पदार्थों का निष्कासन), प्रजनन (वंश वृद्धि), और संवेदनशीलता (पर्यावरण के प्रति प्रतिक्रिया)।
5. स्वपोषी पोषण तथा विषमपोषी पोषण में क्या अंतर है?
स्वपोषी पोषण में जीव सरल अकार्बनिक पदार्थों (कार्बन डाइअॉक्साइड, जल) से सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में अपना भोजन स्वयं तैयार करते हैं। हरे पौधे इसके उदाहरण हैं। विषमपोषी पोषण में जीव अन्य जीवों द्वारा तैयार किए गए जटिल कार्बनिक पदार्थों को भोजन के रूप में ग्रहण करते हैं। जंतु और कवक इसके उदाहरण हैं।
6. प्रकाश संश्लेषण के लिए आवश्यक कच्ची सामग्री पौधा कहाँ से प्राप्त करता है?
प्रकाश संश्लेषण के लिए आवश्यक कच्ची सामग्री पौधा निम्न स्रोतों से प्राप्त करता है: कार्बन डाइअॉक्साइड वायुमंडल से रंध्रों द्वारा, जल मृदा से जड़ों द्वारा, सूर्य का प्रकाश सूर्य से, और क्लोरोफिल पत्तियों के हरितलवकों में उपस्थित होता है। खनिज लवण मृदा से जड़ों द्वारा अवशोषित किए जाते हैं।
7. हमारे आमाशय में अम्ल की भूमिका क्या है?
आमाशय में अम्ल (हाइड्रोक्लोरिक अम्ल) की निम्न भूमिकाएँ हैं: यह अम्लीय माध्यम तैयार करता है जो प्रोटीन पाचक एंजाइम पेप्सिन की क्रिया के लिए अनुकूल होता है। यह भोजन में उपस्थित हानिकारक जीवाणुओं को नष्ट करता है। अम्ल भोजन को नरम बनाता है और उसके पाचन में सहायक होता है।
8. पाचक एंजाइमों का क्या कार्य है?
पाचक एंजाइमों का मुख्य कार्य जटिल खाद्य पदार्थों को सरल अणुओं में तोड़ना है ताकि उनका अवशोषण आहार नाल द्वारा किया जा सके। उदाहरण के लिए: एमिलेज मंड को शर्करा में, पेप्सिन प्रोटीन को पेप्टोन में, लाइपेज वसा को वसा अम्ल और ग्लिसरॉल में परिवर्तित करते हैं।
9. पचे हुए भोजन को अवशोषित करने के लिए क्षुद्रांत्र को कैसे अभिकल्पित किया गया है?
क्षुद्रांत्र पचे हुए भोजन के अवशोषण के लिए विशेष रूप से अभिकल्पित है: इसकी आंतरिक सतह पर अँगुली जैसे प्रवर्ध होते हैं जिन्हें दीर्घरोम कहते हैं, जो अवशोषण सतह को बढ़ाते हैं। दीर्घरोम में रुधिर वाहिकाओं का सघन जाल होता है जो अवशोषित पदार्थों को शरीर के विभिन्न भागों तक पहुँचाता है। क्षुद्रांत्र की लंबाई अधिक होती है जिससे भोजन का पर्याप्त समय तक संपर्क बना रहता है।
10. स्वपोषी पोषण के लिए आवश्यक कच्ची सामग्री पौधा कहाँ से प्राप्त करता है?
पौधे स्वपोषी पोषण के लिए आवश्यक कच्ची सामग्री विभिन्न स्रोतों से प्राप्त करते हैं: कार्बन डाइअॉक्साइड वायुमंडल से रंध्रों द्वारा, जल मृदा से जड़ों द्वारा, सूर्य का प्रकाश सूर्य से, क्लोरोफिल पत्तियों के हरितलवकों में उपस्थित होता है, और खनिज लवण मृदा से जड़ों द्वारा अवशोषित किए जाते हैं।
11. श्वसन के लिए अॉक्सीजन प्राप्त करने की दिशा में एक जलीय जीव की अपेक्षा स्थलीय जीव किस प्रकार लाभप्रद है?
स्थलीय जीव जलीय जीवों की तुलना में श्वसन के लिए अॉक्सीजन प्राप्त करने में लाभप्रद हैं क्योंकि वायुमंडल में अॉक्सीजन की मात्रा जल में विलेय अॉक्सीजन की तुलना में बहुत अधिक होती है। स्थलीय जीवों को अॉक्सीजन प्राप्त करने के लिए कम प्रयास करना पड़ता है और उनकी श्वसन दर धीमी होती है। जलीय जीवों को जल से अॉक्सीजन निकालने के लिए विशेष अंगों की आवश्यकता होती है और उनकी श्वसन दर तेज होती है।
12. ग्लूकोज के अॉक्सीकरण से भिन्न जीवों में ऊर्जा प्राप्त करने के विभिन्न पथ क्या हैं?
ग्लूकोज के अॉक्सीकरण से ऊर्जा प्राप्त करने के तीन मुख्य पथ हैं: वायवीय श्वसन (अॉक्सीजन की उपस्थिति में, माइटोकॉन्ड्रिया में होता है, अधिक ऊर्जा मिलती है), अवायवीय श्वसन (अॉक्सीजन की अनुपस्थिति में, कोशिकाद्रव्य में होता है, कम ऊर्जा मिलती है), और किण्वन (यीस्ट में होता है, इथेनॉल और कार्बन डाइअॉक्साइड बनते हैं)। पेशी कोशिकाओं में अॉक्सीजन की कमी होने पर लैक्टिक अम्ल बनता है।
13. मनुष्यों में अॉक्सीजन तथा कार्बन डाइअॉक्साइड का परिवहन कैसे होता है?
मनुष्यों में अॉक्सीजन का परिवहन हीमोग्लोबिन द्वारा किया जाता है जो लाल रुधिर कणिकाओं में उपस्थित होता है। हीमोग्लोबिन अॉक्सीजन से संयुक्त होकर ऑक्सीहीमोग्लोबिन बनाता है। कार्बन डाइअॉक्साइड का परिवहन तीन विधियों से होता है: रुधिर प्लाज्मा में विलेय अवस्था में, बाइकार्बोनेट आयनों के रूप में, और हीमोग्लोबिन से संयुक्त होकर कार्बामिनो हीमोग्लोबिन के रूप में।
14. गैसों के विनिमय के लिए मानव-फुफ्फुस में अधिकतम क्षेत्रफल को कैसे अभिकल्पित किया है?
फुफ्फुस में गैसों के विनिमय के लिए अधिकतम क्षेत्रफल कूपिकाओं द्वारा प्राप्त किया गया है। फुफ्फुस में लाखों कूपिकाएँ होती हैं जिनकी भित्ति पतली और रुधिर वाहिकाओं से घिरी होती है। कूपिकाओं का कुल सतह क्षेत्रफल लगभग 80 वर्ग मीटर होता है। कूपिकाओं की संरचना गुब्बारे के समान होती है जिससे गैसों का प्रभावी विनिमय हो पाता है।
15. मानव में वहन तंत्र के घटक कौन से हैं? इन घटकों के क्या कार्य हैं?
मानव में वहन तंत्र के मुख्य घटक हैं: हृदय (रुधिर को पंप करने वाला पेशीय अंग), रुधिर वाहिकाएँ (धमनियाँ, शिराएँ, केशिकाएँ - रुधिर का परिवहन), रुधिर (प्लाज्मा और रुधिर कणिकाओं से बना तरल संयोजी ऊतक), और लसिका तंत्र (ऊतक द्रव का वहन और प्रतिरक्षा)। इनका कार्य पदार्थों का शरीर में परिवहन करना है।
16. स्तनधारी तथा पक्षियों में अॉक्सीजनित तथा विअॉक्सीजनित रुधिर को अलग करना क्यों आवश्यक है?
स्तनधारी और पक्षियों में अॉक्सीजनित और विअॉक्सीजनित रुधिर को अलग रखना आवश्यक है क्योंकि इन जीवों को उच्च ऊर्जा की आवश्यकता होती है और उन्हें अपने शरीर का तापमान नियंत्रित रखना होता है। अलग-अलग रुधिर प्रवाह से शरीर के सभी भागों को उच्च दक्षता से अॉक्सीजन की आपूर्ति होती है। चार कोष्ठीय हृदय इस कार्य को पूरा करता है।
17. उच्च संगठित पादप में वहन तंत्र के घटक क्या हैं?
उच्च संगठित पादपों में वहन तंत्र के दो मुख्य घटक हैं: जाइलम (जल और खनिज लवणों का वहन जड़ से पत्तियों तक) और फ्लोएम (प्रकाश संश्लेषण के उत्पादों का वहन पत्तियों से पौधे के अन्य भागों तक)। ये दोनों संवहन ऊतक हैं जो पौधे में पदार्थों के परिवहन का कार्य करते हैं।
18. पादप में जल और खनिज लवण का वहन कैसे होता है?
पादप में जल और खनिज लवण का वहन जाइलम ऊतक द्वारा होता है। जड़ों द्वारा अवशोषित जल और खनिज लवण जाइलम वाहिनियों और वाहिकाओं द्वारा ऊपर की ओर चढ़ते हैं। यह प्रक्रम मुख्य रूप से मूल दाब और वाष्पोत्सर्जन कर्षण द्वारा संपन्न होता है। वाष्पोत्सर्जन पत्तियों से जल के वाष्पीकरण से उत्पन्न चूषण बल जल को ऊपर खींचता है।
19. पादप में भोजन का स्थानांतरण कैसे होता है?
पादप में भोजन का स्थानांतरण फ्लोएम ऊतक द्वारा होता है। प्रकाश संश्लेषण के उत्पाद (मुख्यतः सुक्रोज) पत्तियों से पौधे के अन्य भागों तक फ्लोएम द्वारा पहुँचाए जाते हैं। यह प्रक्रम सक्रिय परिवहन द्वारा होता है जिसमें ऊर्जा (ATP) की आवश्यकता होती है। फ्लोएम में चालनी नलिकाएँ और साथी कोशिकाएँ इस कार्य में सहायक होती हैं।
20. वृक्काणु (नेफ्रॉन) की रचना तथा क्रियाविधि का वर्णन कीजिए।
वृक्काणु वृक्क की क्रियात्मक इकाई है। इसकी रचना में बोमन संपुट (कप के आकार की रचना), ग्लोमेरुलस (रुधिर केशिकाओं का गुच्छ), संग्राहक नलिका और विभिन्न खंड शामिल हैं। क्रियाविधि: ग्लोमेरुलस में रुधिर का निस्यंदन होता है, निस्यंद में उपयोगी पदार्थों का पुनरवशोषण होता है, और अपशिष्ट पदार्थ मूत्र के रूप में संग्राहक नलिका में एकत्र होते हैं।
21. उत्सर्जी उत्पाद से छुटकारा पाने के लिए पादप किन विधियों का उपयोग करते हैं?
पादप उत्सर्जी उत्पादों से छुटकारा पाने के लिए निम्न विधियों का उपयोग करते हैं: वाष्पोत्सर्जन द्वारा अतिरिक्त जल का उत्सर्जन, पत्तियों का गिरना (अपशिष्ट पदार्थ पत्तियों में संचित होते हैं और पत्तियों के गिरने से दूर हो जाते हैं), कोशिकीय रिक्तिकाओं में संचय, रेजिन और गोंद के रूप में संचय, और मृदा में उत्सर्जन (कुछ पदार्थ जड़ों द्वारा मृदा में छोड़े जाते हैं)।
22. मूत्र बनने की मात्रा का नियमन किस प्रकार होता है?
मूत्र बनने की मात्रा का नियमन पुनरवशोषण प्रक्रिया द्वारा होता है। वृक्काणु की नलिकाओं में जल और उपयोगी पदार्थों का पुनरवशोषण होता है। यह प्रक्रिया हार्मोन्स (वैसोप्रेसिन) द्वारा नियंत्रित होती है। शरीर में जल की कमी होने पर अधिक मात्रा में जल का पुनरवशोषण होता है और कम मूत्र बनता है। जल अधिक होने पर कम पुनरवशोषण होता है और अधिक मूत्र बनता है।
23. मनुष्य में वृक्क एक तंत्र का भाग है, जो संबंधित है— (a) पोषण (b) श्वसन (c) उत्सर्जन (d) परिवहन
(c) उत्सर्जन। वृक्क मनुष्य के उत्सर्जन तंत्र का मुख्य अंग है जो नाइट्रोजनी अपशिष्ट पदार्थों (यूरिया, यूरिक अम्ल) को रुधिर से अलग करके मूत्र के रूप में शरीर से बाहर निकालता है।
24. पादप में जाइलम उत्तरदायी है— (a) जल का वहन (b) भोजन का वहन (c) अमीनो अम्ल का वहन (d) अॉक्सीजन का वहन
(a) जल का वहन। जाइलम पादप में जल और खनिज लवणों के वहन के लिए उत्तरदायी है। यह जड़ों से पत्तियों तक जल का परिवहन करता है।
25. स्वपोषी पोषण के लिए आवश्यक है— (a) कार्बन डाइअॉक्साइड तथा जल (b) क्लोरोफिल (c) सूर्य का प्रकाश (d) उपरोक्त सभी
(d) उपरोक्त सभी। स्वपोषी पोषण के लिए कार्बन डाइअॉक्साइड, जल, क्लोरोफिल और सूर्य का प्रकाश सभी आवश्यक हैं। इनकी उपस्थिति में ही प्रकाश संश्लेषण की क्रिया संपन्न होती है।
26. पायरुवेट के विखंडन से यह कार्बन डाइअॉक्साइड, जल तथा ऊर्जा देता है और यह क्रिया होती है— (a) कोशिकाद्रव्य (b) माइटोकॉन्ड्रिया (c) हरित लवक (d) केंद्रक
(b) माइटोकॉन्ड्रिया। पायरुवेट का पूर्ण विखंडन (वायवीय श्वसन) माइटोकॉन्ड्रिया में होता है जिससे कार्बन डाइअॉक्साइड, जल और ऊर्जा प्राप्त होती है।
27. हमारे शरीर में वसा का पाचन कैसे होता है? यह प्रक्रम कहाँ होता है?
वसा का पाचन मुख्य रूप से क्षुद्रांत्र में होता है। यकृत से स्रावित पित्तरस वसा को इमल्सीकृत करता है (छोटी गोलिकाओं में बदलता है)। अग्न्याशय से स्रावित लाइपेज एंजाइम इमल्सीकृत वसा का पाचन करके उसे वसा अम्ल और ग्लिसरॉल में परिवर्तित करता है। क्षुद्रांत्र की भित्ति से स्रावित आंत्र रस भी वसा के पाचन में सहायक होता है।
28. भोजन के पाचन में लार की क्या भूमिका है?
लार भोजन के पाचन में निम्न भूमिकाएँ निभाती है: यह भोजन को नम करके निगलने योग्य बनाती है। लार में उपस्थित लार एमिलेज एंजाइम मंड (स्टार्च) का पाचन शुरू करता है और उसे शर्करा में परिवर्तित करता है। लार भोजन को मुलायम बनाती है और मुँह को साफ रखती है। यह भोजन के स्वाद को ग्रहण करने में भी सहायक होती है।
29. स्वपोषी पोषण के लिए आवश्यक परिस्थितियाँ कौन सी हैं और उसके उपोत्पाद क्या हैं?
स्वपोषी पोषण (प्रकाश संश्लेषण) के लिए आवश्यक परिस्थितियाँ हैं: सूर्य का प्रकाश, क्लोरोफिल, कार्बन डाइअॉक्साइड, और जल। इसके उपोत्पाद हैं: कार्बोहाइड्रेट (मुख्य उत्पाद), अॉक्सीजन (उपोत्पाद), और कभी-कभी जल भी उपोत्पाद के रूप में निकलता है।
30. वायवीय तथा अवायवीय श्वसन में क्या अंतर हैं? कुछ जीवों के नाम लिखिए जिनमें अवायवीय श्वसन होता है।
वायवीय और अवायवीय श्वसन में अंतर: वायवीय श्वसन अॉक्सीजन की उपस्थिति में होता है, अधिक ऊर्जा मुक्त होती है, अंतिम उत्पाद कार्बन डाइअॉक्साइड और जल होते हैं, यह माइटोकॉन्ड्रिया में होता है। अवायवीय श्वसन अॉक्सीजन की अनुपस्थिति में होता है, कम ऊर्जा मुक्त होती है, अंतिम उत्पाद लैक्टिक अम्ल या इथेनॉल और कार्बन डाइअॉक्साइड होते हैं, यह कोशिकाद्रव्य में होता है। अवायवीय श्वसन वाले जीव: यीस्ट, कुछ जीवाणु, मनुष्य की पेशी कोशिकाएँ (अॉक्सीजन की कमी में)।
31. गैसों के अधिकतम विनिमय के लिए कूपिकाएँ किस प्रकार अभिकल्पित हैं?
कूपिकाएँ गैसों के अधिकतम विनिमय के लिए निम्न प्रकार से अभिकल्पित हैं: उनकी संख्या अत्यधिक (लाखों) है जिससे सतह क्षेत्रफल बहुत अधिक (लगभग 80 वर्ग मीटर) हो जाता है। उनकी भित्ति अत्यंत पतली (एक कोशिका मोटी) होती है जिससे गैसों का विसरण आसानी से होता है। कूपिकाएँ रुधिर केशिकाओं के सघन जाल से घिरी होती हैं। उनमें नमी होती है जो गैसों के विलेय होने में सहायक है।
32. हमारे शरीर में हीमोग्लोबिन की कमी के क्या परिणाम हो सकते हैं?
हीमोग्लोबिन की कमी (रक्ताल्पता या एनीमिया) के परिणाम: शरीर के विभिन्न भागों में अॉक्सीजन की आपूर्ति कम हो जाती है। थकान, कमजोरी और चक्कर आने लगते हैं। त्वचा पीली पड़ जाती है। साँस फूलने लगती है। शारीरिक और मानसिक कार्यक्षमता कम हो जाती है। हृदय को अधिक कार्य करना पड़ता है। गंभीर स्थिति में अंग क्षति भी हो सकती है।
33. मनुष्य में दोहरा परिसंचरण की व्याख्या कीजिए। यह क्यों आवश्यक है?
दोहरा परिसंचरण में रुधिर एक पूर्ण चक्र में दो बार हृदय से गुजरता है: एक बार फुफ्फुसीय परिसंचरण (हृदय → फुफ्फुस → हृदय) और एक बार कायिक परिसंचरण (हृदय → शरीर → हृदय)। यह आवश्यक है क्योंकि इससे अॉक्सीजनित और विअॉक्सीजनित रुधिर अलग रहते हैं, शरीर के सभी भागों को उच्च दाब से अॉक्सीजन युक्त रुधिर मिलता है, और शरीर का तापमान नियंत्रित रहता है।
34. जाइलम तथा फ्लोएम में पदार्थों के वहन में क्या अंतर है?
जाइलम और फ्लोएम में पदार्थों के वहन में अंतर: जाइलम जल और खनिज लवणों का वहन जड़ से पत्तियों तक (एक दिशा में) करता है, जबकि फ्लोएम प्रकाश संश्लेषण के उत्पादों का वहन पत्तियों से पौधे के अन्य भागों (दोनों दिशाओं में) करता है। जाइलम में वहन भौतिक बलों (वाष्पोत्सर्जन कर्षण) द्वारा होता है, जबकि फ्लोएम में वहन सक्रिय परिवहन (ऊर्जा की आवश्यकता) द्वारा होता है।
35. फुफ्फुस में कूपिकाओं की तथा वृक्क में वृक्काणु (नेफ्रान) की रचना तथा क्रियाविधि की तुलना कीजिए।
कूपिकाएँ और वृक्काणु दोनों निस्यंदन की इकाइयाँ हैं पर कार्य भिन्न है। कूपिकाएँ फुफ्फुस में गैसों के विनिमय के लिए हैं: पतली भित्ति, रुधिर केशिकाओं से घिरी, बड़ी सतह क्षेत्र। वृक्काणु वृक्क में रुधिर से अपशिष्ट पदार्थों को निकालने के लिए हैं: ग्लोमेरुलस (केशिका गुच्छ), बोमन संपुट, नलिकाएँ। कूपिकाओं में विसरण द्वारा गैसों का आदान-प्रदान होता है, वृक्काणु में निस्यंदन और पुनरवशोषण द्वारा मूत्र बनता है।
36. विषाणु को सजीव माना जाता है या नहीं? कारण सहित समझाइए।
विषाणु को सजीव और निर्जीव के बीच की श्रेणी में रखा जाता है। जब विषाणु किसी जीवित कोशिका के बाहर होते हैं तो वे निर्जीव की तरह व्यवहार करते हैं - उनमें चयापचय की क्रियाएँ नहीं होतीं। लेकिन जब वे किसी जीवित कोशिका में प्रवेश करते हैं तो सजीव की तरह व्यवहार करने लगते हैं - प्रजनन करते हैं और चयापचय क्रियाओं को नियंत्रित करते हैं। इस द्वैत स्वभाव के कारण उन्हें पूर्ण रूप से सजीव नहीं माना जाता।
37. जीवों के शरीर को मरम्मत तथा अनुरक्षण की आवश्यकता क्यों होती है?
जीवों के शरीर को मरम्मत और अनुरक्षण की आवश्यकता इसलिए होती है क्योंकि समय के साथ-साथ और पर्यावरण के प्रभाव के कारण शरीर की संरचनाएँ टूट-फूट और क्षतिग्रस्त होती रहती हैं। सभी संरचनाएँ अणुओं से बनी होती हैं और इन अणुओं को लगातार गतिशील बनाए रखना आवश्यक है। मरम्मत और अनुरक्षण के बिना जीव लंबे समय तक जीवित नहीं रह सकता।
38. जैव प्रक्रम क्या है? उदाहरण सहित समझाइए।
जैव प्रक्रम वे प्रक्रियाएँ हैं जो मिलकर जीव के अनुरक्षण का कार्य करती हैं। ये प्रक्रम निरंतर चलते रहते हैं चाहे जीव कोई विशेष कार्य कर रहा हो या नहीं। उदाहरण: पोषण, श्वसन, परिवहन, उत्सर्जन, प्रजनन आदि। ये सभी प्रक्रम जीव के जीवित रहने और वृद्धि के लिए आवश्यक हैं।
39. पोषण किसे कहते हैं? यह क्यों आवश्यक है?
पोषण वह प्रक्रिया है जिसमें जीव बाहर से भोजन ग्रहण करते हैं। यह आवश्यक है क्योंकि जीवों को ऊर्जा की आवश्यकता होती है जो भोजन से प्राप्त होती है। भोजन शरीर की वृद्धि, विकास, मरम्मत और विभिन्न जैविक क्रियाओं के लिए आवश्यक पदार्थ भी प्रदान करता है। पृथ्वी पर जीवन कार्बन आधारित अणुओं पर निर्भर है और भोजन इन अणुओं का स्रोत है।
40. श्वसन किसे कहते हैं? यह कितने प्रकार का होता है?
श्वसन वह प्रक्रिया है जिसमें जीव भोजन के अणुओं का विखंडन करके ऊर्जा प्राप्त करते हैं। इसमें अॉक्सीजन का उपयोग करके खाद्य स्रोत का विघटन किया जाता है। श्वसन दो प्रकार का होता है: वायवीय श्वसन (अॉक्सीजन की उपस्थिति में) और अवायवीय श्वसन (अॉक्सीजन की अनुपस्थिति में)। किण्वन भी अवायवीय श्वसन का एक प्रकार है।
41. एककोशिकीय और बहुकोशिकीय जीवों में पोषण प्रक्रिया किस प्रकार भिन्न है?
एककोशिकीय जीवों में पूरी कोशिका सतह पर्यावरण के संपर्क में होती है, इसलिए भोजन ग्रहण करने, गैसों का आदान-प्रदान करने और वर्ज्य पदार्थ निकालने के लिए विशेष अंगों की आवश्यकता नहीं होती। बहुकोशिकीय जीवों में सभी कोशिकाएँ सीधे पर्यावरण के संपर्क में नहीं होतीं, इसलिए विशेष अंग व तंत्र विकसित हुए हैं जैसे पाचन तंत्र, श्वसन तंत्र, उत्सर्जन तंत्र आदि।
42. प्रकाश संश्लेषण की क्रिया में क्या-क्या घटनाएँ होती हैं?
प्रकाश संश्लेषण की क्रिया में निम्न घटनाएँ होती हैं: (1) क्लोरोफिल द्वारा प्रकाश ऊर्जा का अवशोषण, (2) प्रकाश ऊर्जा का रासायनिक ऊर्जा में रूपांतरण और जल अणुओं का हाइड्रोजन और अॉक्सीजन में अपघटन, (3) कार्बन डाइअॉक्साइड का कार्बोहाइड्रेट में अपचयन। ये चरण तत्काल एक के बाद नहीं भी हो सकते, जैसे मरुद्भिद पौधों में रात्रि में कार्बन डाइअॉक्साइड लिया जाता है और दिन में उसका उपयोग होता है।
43. पौधे कार्बन डाइअॉक्साइड कैसे प्राप्त करते हैं?
पौधे कार्बन डाइअॉक्साइड मुख्य रूप से पत्तियों की सतह पर स्थित रंध्रों द्वारा प्राप्त करते हैं। रंध्र सूक्ष्म छिद्र होते हैं जिनके द्वारा गैसों का आदान-प्रदान होता है। कुछ मात्रा में गैसों का आदान-प्रदान तने, जड़ और पत्तियों की सतह से भी होता है। रंध्रों का खुलना और बंद होना द्वार कोशिकाओं द्वारा नियंत्रित होता है। जब द्वार कोशिकाओं में जल आता है तो वे फूल जाती हैं और रंध्र खुल जाता है।
44. पौधों को अन्य कच्ची सामग्री की आवश्यकता क्यों होती है और वे इसे कहाँ से प्राप्त करते हैं?
पौधों को शरीर निर्माण के लिए अन्य कच्ची सामग्री (नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, लोहा, मैग्नीशियम आदि) की आवश्यकता होती है। ये सामग्री वे मृदा से प्राप्त करते हैं। नाइट्रोजन एक आवश्यक तत्व है जिसका उपयोग प्रोटीन और अन्य यौगिकों के संश्लेषण में किया जाता है। पौधे इसे अकार्बनिक नाइट्रेट या नाइट्राइट के रूप में लेते हैं, या जीवाणुओं द्वारा वायुमंडलीय नाइट्रोजन से बने कार्बनिक पदार्थों के रूप में ग्रहण करते हैं।
45. विषमपोषी पोषण में भोजन ग्रहण करने की विभिन्न विधियाँ कौन-सी हैं?
विषमपोषी पोषण में भोजन ग्रहण करने की विभिन्न विधियाँ हैं: कुछ जीव भोज्य पदार्थों का विघटन शरीर के बाहर ही कर देते हैं और तब उसका अवशोषण करते हैं (जैसे कवक)। अन्य जीव संपूर्ण भोज्य पदार्थ का अंतर्ग्रहण करते हैं और उनका पाचन शरीर के अंदर होता है (जैसे जंतु)। कुछ जीव पौधों और जंतुओं को बिना मारे उनसे पोषण प्राप्त करते हैं (जैसे अमरबेल, किलनी)। भोजन ग्रहण करने की विधि जीव की शारीरिक संरचना और कार्यशैली पर निर्भर करती है।
46. अमीबा में पोषण किस प्रकार होता है?
अमीबा में पोषण: अमीबा कोशिका सतह से अँगुली जैसे अस्थायी प्रवर्ध (पादाभ) की मदद से भोजन ग्रहण करता है। ये प्रवर्ध भोजन के कणों को घेर लेते हैं और संगलित होकर खाद्य रिक्तिका बनाते हैं। खाद्य रिक्तिका के अंदर जटिल पदार्थों का विघटन सरल पदार्थों में किया जाता है और वे कोशिकाद्रव्य में विसरित हो जाते हैं। बचा हुआ अपच पदार्थ कोशिका की सतह की ओर गति करता है और शरीर से बाहर निष्कासित कर दिया जाता है।
47. मानव पाचन तंत्र के विभिन्न भागों के नाम और कार्य बताइए।
मानव पाचन तंत्र के भाग और उनके कार्य: मुँह (भोजन को चबाना और लार के साथ मिलाना), आमाशय (भोजन को संग्रहीत करना और प्रोटीन का आंशिक पाचन), क्षुद्रांत्र (कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन और वसा का पूर्ण पाचन और अवशोषण), बृहदांत्र (जल का अवशोषण और अपशिष्ट का संग्रह), गुदा (अपशिष्ट का निष्कासन)। यकृत, अग्न्याशय और पित्ताशय सहायक अंग हैं।
48. क्षुद्रांत्र में भोजन के पाचन और अवशोषण की प्रक्रिया कैसे होती है?
क्षुद्रांत्र में भोजन का पाचन यकृत (पित्तरस) और अग्न्याशय (अग्न्याशयिक रस) के स्रावों से होता है। पित्तरस वसा का इमल्सीकरण करता है। अग्न्याशयिक रस में ट्रिप्सिन (प्रोटीन पाचक) और लाइपेज (वसा पाचक) एंजाइम होते हैं। क्षुद्रांत्र की भित्ति से स्रावित आंत्र रस अंतिम पाचन करता है। अवशोषण दीर्घरोमों द्वारा होता है जो अवशोषण सतह बढ़ाते हैं। दीर्घरोमों में रुधिर वाहिकाएँ अवशोषित पदार्थों को शरीर के सभी भागों तक पहुँचाती हैं।
49. दंतक्षय (दंतक्षरण) क्या है और यह कैसे होता है?
दंतक्षय दाँतों के इनेमल और डेंटीन के शनैः-शनैः मृदुकरण के कारण होता है। यह तब प्रारंभ होता है जब जीवाणु शर्करा पर क्रिया करके अम्ल बनाते हैं। इससे इनेमल मृदु या बिखनिजीकृत हो जाता है। जीवाणु खाद्य कणों के साथ मिलकर दाँतों पर दंतप्लाक बना देते हैं जो दाँत को ढक लेता है। लार अम्ल को उदासीन करने के लिए दंत सतह तक नहीं पहुँच पाती। भोजनोपरांत दाँत साफ करने से प्लाक हट सकता है। उपचार न होने पर जीवाणु मज्जा तक पहुँच सकते हैं।
50. श्वसन में ATP (एडेनोसिन ट्राइफॉस्फेट) की क्या भूमिका है?
ATP (एडेनोसिन ट्राइफॉस्फेट) कोशिका की ऊर्जा मुद्रा है। श्वसन प्रक्रिया में मुक्त ऊर्जा का उपयोग ADP (एडेनोसिन डाइफॉस्फेट) और अकार्बनिक फॉस्फेट से ATP अणु बनाने में किया जाता है। ATP के विखंडन से निश्चित मात्रा में ऊर्जा मुक्त होती है (लगभग 30.5 kJ/mol) जो कोशिका में होने वाली आवश्यक क्रियाओं (जैसे पेशी संकुचन, प्रोटीन संश्लेषण, तंत्रिका आवेग संचरण) के लिए उपयोग की जाती है।
51. पौधे गैसों का आदान-प्रदान कैसे करते हैं?
पौधे गैसों का आदान-प्रदान मुख्य रूप से रंध्रों द्वारा करते हैं। रंध्र पत्तियों की सतह पर सूक्ष्म छिद्र होते हैं। अंतर्कोशिकीय अवकाश सभी कोशिकाओं को वायु के संपर्क में रखते हैं। गैसों का आदान-प्रदान विसरण द्वारा होता है। रात्रि में, जब प्रकाश संश्लेषण नहीं होता, कार्बन डाइअॉक्साइड का निष्कासन मुख्य क्रिया है। दिन में, श्वसन से निकली CO₂ प्रकाश संश्लेषण में प्रयुक्त हो जाती है और अॉक्सीजन का निकलना मुख्य घटना है।
52. जलीय जीवों की श्वसन द्रुत क्यों होती है?
जलीय जीवों की श्वसन द्रुत इसलिए होती है क्योंकि जल में विलेय अॉक्सीजन की मात्रा वायु में अॉक्सीजन की मात्रा की तुलना में बहुत कम होती है। जलीय जीवों को पर्याप्त अॉक्सीजन प्राप्त करने के लिए अधिक प्रयास करना पड़ता है। मछली अपने मुँह के द्वारा जल लेती है और बलपूर्वक इसे क्लोम तक पहुँचाती है, जहाँ विलेय अॉक्सीजन रुधिर द्वारा अवशोषित कर ली जाती है। तेज श्वसन दर से वे जल से अधिकतम अॉक्सीजन प्राप्त कर पाते हैं।
53. मानव श्वसन तंत्र के विभिन्न भागों के नाम और कार्य बताइए।
मानव श्वसन तंत्र के भाग और कार्य: नासाद्वार (वायु का प्रवेश, धूल निस्यंदन), श्वासनली (वायु मार्ग), कंठ (वायु मार्ग को खुला रखना), श्वसनी और श्वसनिकाएँ (वायु का वितरण), कूपिकाएँ (गैसों का विनिमय), फुफ्फुस (कूपिकाओं को आधार प्रदान करना)। डायाफ्राम और पसलियाँ श्वसन क्रिया में सहायक होती हैं।
54. धूम्रपान फेफड़ों के लिए क्यों हानिकारक है?
धूम्रपान फेफड़ों के लिए हानिकारक है क्योंकि: यह श्वासनली में उपस्थित सिलिया (छोटे बाल जैसी संरचनाएँ) को नष्ट कर देता है जो वायु से रोगाणु, धूल और हानिकारक कणों को हटाने में मदद करते हैं। धूम्रपान से हानिकारक रसायन फेफड़ों में प्रवेश कर जाते हैं जो संक्रमण, खाँसी और फेफड़ों के कैंसर का कारण बनते हैं। यह कूपिकाओं को क्षति पहुँचाता है और गैस विनिमय की क्षमता को कम करता है।
55. रुधिर क्या है और इसके कार्य क्या हैं?
रुधिर एक तरल संयोजी ऊतक है जिसमें प्लाज्मा (तरल माध्यम) और रुधिर कणिकाएँ (लाल रुधिर कणिकाएँ, श्वेत रुधिर कणिकाएँ, प्लेटलैट्स) होती हैं। रुधिर के कार्य: अॉक्सीजन और कार्बन डाइअॉक्साइड का परिवहन, पोषक पदार्थों का वितरण, अपशिष्ट पदार्थों का उत्सर्जन अंगों तक ले जाना, शरीर का तापमान नियंत्रण, रोगाणुओं से सुरक्षा (श्वेत रुधिर कणिकाएँ), रक्तस्राव रोकना (प्लेटलैट्स)।
56. हृदय की संरचना और कार्यप्रणाली क्या है?
हृदय एक पेशीय अंग है जो चार कोष्ठों में बँटा होता है: दायाँ अलिंद, दायाँ निलय, बायाँ अलिंद, बायाँ निलय। कार्यप्रणाली: दायाँ अलिंद शरीर से विअॉक्सीजनित रुधिर प्राप्त करता है → दायाँ निलय इसे फुफ्फुस में पंप करता है → फुफ्फुस में अॉक्सीजनीकरण → बायाँ अलिंद अॉक्सीजनित रुधिर प्राप्त करता है → बायाँ निलय इसे शरीर में पंप करता है। वाल्व रुधिर के उल्टी दिशा में प्रवाह को रोकते हैं। निलय की भित्ति अलिंद से मोटी होती है क्योंकि उन्हें रुधिर को दूर तक पंप करना होता है।
57. धमनी, शिरा और केशिका में क्या अंतर है?
धमनी, शिरा और केशिका में अंतर: धमनी रुधिर को हृदय से शरीर के अंगों तक ले जाती है, भित्ति मोटी और लचीली होती है, रुधिर दाब उच्च होता है, वाल्व नहीं होते। शिरा रुधिर को अंगों से हृदय तक लाती है, भित्ति पतली होती है, रुधिर दाब कम होता है, वाल्व होते हैं। केशिका धमनी और शिरा के बीच की सबसे छोटी वाहिकाएँ हैं, भित्ति एक कोशिकीय मोटी होती है, रुधिर और ऊतक के बीच पदार्थों का विनिमय इन्हीं के द्वारा होता है।
58. लसिका (लसीका) क्या है और इसके क्या कार्य हैं?
लसिका (लसीका) एक रंगहीन द्रव है जो ऊतकों के अंतर्कोशिकीय अवकाश में पाया जाता है। यह रुधिर प्लाज्मा के समान है पर इसमें प्रोटीन कम होते हैं। लसिका के कार्य: पचे हुए वसा का परिवहन (क्षुद्रांत्र से रुधिर तक), अतिरिक्त ऊतक द्रव को वापस रुधिर परिसंचरण में लाना, रोगाणुओं से सुरक्षा (लसिका में लिम्फोसाइट्स होते हैं), शरीर के विभिन्न भागों से अपशिष्ट पदार्थों को हटाना।
59. वाष्पोत्सर्जन क्या है और इसके क्या लाभ हैं?
वाष्पोत्सर्जन पादप के वायवीय भागों (मुख्यतः पत्तियों) द्वारा वाष्प के रूप में जल की हानि है। इसके लाभ: जल के अवशोषण और जड़ से पत्तियों तक जल के परिवहन में सहायक (वाष्पोत्सर्जन कर्षण उत्पन्न करता है), पौधे के तापमान का नियमन करता है (वाष्पीकरण द्वारा ठंडक), खनिज लवणों के परिवहन में सहायक, वातावरण में आर्द्रता बनाए रखने में सहायक।
60. कृत्रिम वृक्क (डायलिसिस) क्या है और यह कैसे कार्य करता है?
कृत्रिम वृक्क (डायलिसिस) एक चिकित्सा प्रक्रिया है जिसका उपयोग वृक्क के कार्य न करने पर रुधिर से अपशिष्ट पदार्थों और अतिरिक्त जल को निकालने के लिए किया जाता है। कार्यप्रणाली: रोगी के रुधिर को अर्धपारगम्य झिल्ली वाली नलिकाओं से प्रवाहित किया जाता है जो अपोहन द्रव से भरी टंकी में डूबी होती हैं। विसरण द्वारा अपशिष्ट पदार्थ रुधिर से अपोहन द्रव में चले जाते हैं। शुद्धिकृत रुधिर वापस रोगी के शरीर में पंपित कर दिया जाता है। यह वृक्क के निस्यंदन कार्य की नकल करता है पर पुनरवशोषण नहीं करता।
ध्यान दें: ये सभी प्रश्न और उत्तर जैव प्रक्रम अध्याय के महत्वपूर्ण बिंदुओं पर आधारित हैं। परीक्षा की तैयारी के लिए इन्हें ध्यानपूर्वक अध्ययन करें। प्रत्येक उत्तर में अध्याय के मुख्य शब्दों को हाइलाइट किया गया है जो अवधारणाओं को समझने में सहायक होंगे।
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