अध्याय 4: कार्बन एवं उसके यौगिक - 60 प्रश्नोत्तरी
कक्षा 10 विज्ञान | CBSE NCERT पैटर्न
लघु उत्तरीय प्रश्न (1-20)
1. कार्बन की संयोजकता कितनी होती है और क्यों?
उत्तर: कार्बन की संयोजकता 4 होती है। क्योंकि इसके सबसे बाहरी कोश (L कोश) में 4 इलेक्ट्रॉन होते हैं और यह उत्कृष्ट गैस विन्यास (8 इलेक्ट्रॉन) प्राप्त करने के लिए 4 और इलेक्ट्रॉनों की साझेदारी करता है।
2. सहसंयोजी बंध क्या है? उदाहरण दीजिए।
उत्तर: दो परमाणुओं के बीच इलेक्ट्रॉनों की साझेदारी से बनने वाला बंध सहसंयोजी बंध कहलाता है। उदाहरण: मेथेन (CH₄) में कार्बन और हाइड्रोजन के बीच सहसंयोजी बंध होता है।
3. मेथेन की इलेक्ट्रॉन बिंदु संरचना बनाइए।
उत्तर:
H
·
H · C · H
·
H
4. कार्बन के दो अपररूपों के नाम लिखिए।
उत्तर: हीरा और ग्रेफाइट।
5. ग्रेफाइट विद्युत का सुचालक क्यों है?
उत्तर: ग्रेफाइट में कार्बन के प्रत्येक परमाणु केवल तीन अन्य कार्बन परमाणुओं से जुड़े होते हैं, जिससे एक मुक्त इलेक्ट्रॉन बच जाता है। यह मुक्त इलेक्ट्रॉन विद्युत चालन में सहायक होता है।
6. कार्बन में श्रृंखलन क्या है?
उत्तर: कार्बन परमाणुओं की अन्य कार्बन परमाणुओं के साथ लंबी श्रृंखला बनाने की क्षमता को श्रृंखलन कहते हैं।
7. संतृप्त और असंतृप्त हाइड्रोकार्बन में अंतर बताइए।
उत्तर: संतृप्त हाइड्रोकार्बन में कार्बन परमाणुओं के बीच केवल एकल बंध होते हैं (जैसे एल्केन)। असंतृप्त हाइड्रोकार्बन में कार्बन परमाणुओं के बीच द्वि-बंध या त्रि-बंध होते हैं (जैसे एल्कीन, एल्काइन)।
8. एल्केन का सामान्य सूत्र लिखिए।
उत्तर: CₙH₂ₙ₊₂
9. एल्कीन का सामान्य सूत्र लिखिए।
उत्तर: CₙH₂ₙ
10. एल्काइन का सामान्य सूत्र लिखिए।
उत्तर: CₙH₂ₙ₋₂
11. समजातीय श्रेणी क्या है?
उत्तर: कार्बन यौगिकों की वह श्रृंखला जिसमें सदस्यों के बीच -CH₂- इकाई का अंतर हो और सभी में एक ही प्रकार्यात्मक समूह जुड़ा हो, समजातीय श्रेणी कहलाती है। उदाहरण: एल्केन श्रृंखला।
12. प्रोपेन का आणविक सूत्र लिखिए।
उत्तर: C₃H₈
13. ब्यूटेन (C₄H₁₀) के संरचनात्मक समावयव कितने हो सकते हैं?
उत्तर: दो - n-ब्यूटेन (सीधी श्रृंखला) और आइसोब्यूटेन (शाखित श्रृंखला)।
14. कार्बोक्सिलिक अम्ल समूह का सूत्र लिखिए।
उत्तर: -COOH
15. एथेनॉल और सोडियम की अभिक्रिया का रासायनिक समीकरण लिखिए।
उत्तर: 2Na + 2CH₃CH₂OH → 2CH₃CH₂O⁻Na⁺ + H₂
(सोडियम एथॉक्साइड और हाइड्रोजन गैस बनती है)
(सोडियम एथॉक्साइड और हाइड्रोजन गैस बनती है)
16. एथेनॉल के एथीन में परिवर्तन की अभिक्रिया लिखिए।
उत्तर: CH₃-CH₂OH →[सांद्र H₂SO₄, 443K]→ CH₂=CH₂ + H₂O
(निर्जलीकरण अभिक्रिया)
(निर्जलीकरण अभिक्रिया)
17. एथेनॉइक अम्ल का सामान्य नाम क्या है?
उत्तर: एसीटिक अम्ल।
18. ग्लेशियल एसीटिक अम्ल क्या है?
उत्तर: शुद्ध एथेनॉइक अम्ल (100%) जिसका गलनांक 290 K है और यह ठंड में जम जाता है।
19. एस्टरीकरण अभिक्रिया क्या है?
उत्तर: कार्बोक्सिलिक अम्ल और एल्कोहल की अभिक्रिया से एस्टर और जल बनने की अभिक्रिया को एस्टरीकरण कहते हैं। उदाहरण: एथेनॉइक अम्ल और एथेनॉल से एथिल एसीटेट बनता है।
20. साबुन क्या है?
उत्तर: साबुन लंबी श्रृंखला वाले कार्बोक्सिलिक अम्लों (वसा अम्ल) के सोडियम या पोटैशियम लवण होते हैं।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (21-60)
21. कार्बन की सर्वतोमुखी प्रकृति के कारणों की विस्तार से व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
कार्बन एक अद्वितीय तत्व है जो असंख्य यौगिक बनाता है। इसकी सर्वतोमुखी प्रकृति के पाँच प्रमुख कारण हैं:
1. चतुःसंयोजकता: कार्बन की संयोजकता 4 होती है, जिसके कारण यह चार अन्य परमाणुओं (कार्बन या अन्य तत्वों) के साथ बंध बना सकता है।
2. श्रृंखलन: कार्बन परमाणुओं में अन्य कार्बन परमाणुओं के साथ लंबी श्रृंखलाएँ, शाखाएँ और वलय बनाने की अद्वितीय क्षमता होती है। यह गुण केवल कार्बन में ही इतनी मात्रा में पाया जाता है।
3. कार्बन-कार्बन बंध की प्रबलता: कार्बन-कार्बन एकल, द्वि और त्रि बंध अत्यंत प्रबल और स्थायी होते हैं। C-C एकल बंध की बंध ऊर्जा 348 kJ/mol होती है जो इसे बहुत स्थायी बनाती है।
4. विभिन्न तत्वों के साथ बंधन: कार्बन हाइड्रोजन (H), ऑक्सीजन (O), नाइट्रोजन (N), सल्फर (S), क्लोरीन (Cl) आदि अनेक तत्वों के साथ सहसंयोजी बंध बनाकर विविध यौगिकों का निर्माण कर सकता है।
5. समजातीय श्रेणी का निर्माण: कार्बन समान प्रकार्यात्मक समूह वाले यौगिकों की लंबी श्रृंखला बना सकता है, जिससे विभिन्न लंबाई के अणु बनते हैं जिनके रासायनिक गुण समान होते हैं।
इन्हीं गुणों के कारण कार्बन यौगिकों की संख्या अन्य सभी तत्वों के यौगिकों से कहीं अधिक है और यह जीवन का आधार बनता है।
कार्बन एक अद्वितीय तत्व है जो असंख्य यौगिक बनाता है। इसकी सर्वतोमुखी प्रकृति के पाँच प्रमुख कारण हैं:
1. चतुःसंयोजकता: कार्बन की संयोजकता 4 होती है, जिसके कारण यह चार अन्य परमाणुओं (कार्बन या अन्य तत्वों) के साथ बंध बना सकता है।
2. श्रृंखलन: कार्बन परमाणुओं में अन्य कार्बन परमाणुओं के साथ लंबी श्रृंखलाएँ, शाखाएँ और वलय बनाने की अद्वितीय क्षमता होती है। यह गुण केवल कार्बन में ही इतनी मात्रा में पाया जाता है।
3. कार्बन-कार्बन बंध की प्रबलता: कार्बन-कार्बन एकल, द्वि और त्रि बंध अत्यंत प्रबल और स्थायी होते हैं। C-C एकल बंध की बंध ऊर्जा 348 kJ/mol होती है जो इसे बहुत स्थायी बनाती है।
4. विभिन्न तत्वों के साथ बंधन: कार्बन हाइड्रोजन (H), ऑक्सीजन (O), नाइट्रोजन (N), सल्फर (S), क्लोरीन (Cl) आदि अनेक तत्वों के साथ सहसंयोजी बंध बनाकर विविध यौगिकों का निर्माण कर सकता है।
5. समजातीय श्रेणी का निर्माण: कार्बन समान प्रकार्यात्मक समूह वाले यौगिकों की लंबी श्रृंखला बना सकता है, जिससे विभिन्न लंबाई के अणु बनते हैं जिनके रासायनिक गुण समान होते हैं।
इन्हीं गुणों के कारण कार्बन यौगिकों की संख्या अन्य सभी तत्वों के यौगिकों से कहीं अधिक है और यह जीवन का आधार बनता है।
22. सहसंयोजी बंध का निर्माण कैसे होता है? मेथेन के उदाहरण द्वारा समझाइए।
उत्तर:
सहसंयोजी बंध: दो परमाणुओं के बीच इलेक्ट्रॉनों की साझेदारी से बनने वाला बंध सहसंयोजी बंध कहलाता है। प्रत्येक परमाणु एक इलेक्ट्रॉन युग्म की साझेदारी करता है ताकि दोनों अपना बाहरी कोश पूरा कर सकें (अष्टक नियम)।
मेथेन (CH₄) में सहसंयोजी बंधन:
1. परमाणुओं का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास:
- कार्बन (परमाणु संख्या 6): K=2, L=4 (बाहरी कोश में 4 इलेक्ट्रॉन)
- हाइड्रोजन (परमाणु संख्या 1): K=1 (बाहरी कोश में 1 इलेक्ट्रॉन)
2. सामर्थ्य प्राप्ति की आवश्यकता:
- कार्बन को अष्टक (8 इलेक्ट्रॉन) पूरा करने के लिए 4 और इलेक्ट्रॉन चाहिए
- हाइड्रोजन को द्विक (2 इलेक्ट्रॉन) पूरा करने के लिए 1 और इलेक्ट्रॉन चाहिए
3. इलेक्ट्रॉन साझेदारी:
- एक कार्बन परमाणु चार हाइड्रोजन परमाणुओं के साथ चार इलेक्ट्रॉन युग्मों की साझेदारी करता है
- प्रत्येक C-H बंध एक इलेक्ट्रॉन युग्म (कार्बन का 1 इलेक्ट्रॉन + हाइड्रोजन का 1 इलेक्ट्रॉन) से बनता है
4. परिणाम:
- कार्बन: अपने 4 इलेक्ट्रॉन + हाइड्रोजन के 4 इलेक्ट्रॉन = 8 इलेक्ट्रॉन (अष्टक पूरा)
- प्रत्येक हाइड्रोजन: अपना 1 इलेक्ट्रॉन + कार्बन का 1 इलेक्ट्रॉन = 2 इलेक्ट्रॉन (द्विक पूरा)
5. संरचना:
सहसंयोजी बंध: दो परमाणुओं के बीच इलेक्ट्रॉनों की साझेदारी से बनने वाला बंध सहसंयोजी बंध कहलाता है। प्रत्येक परमाणु एक इलेक्ट्रॉन युग्म की साझेदारी करता है ताकि दोनों अपना बाहरी कोश पूरा कर सकें (अष्टक नियम)।
मेथेन (CH₄) में सहसंयोजी बंधन:
1. परमाणुओं का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास:
- कार्बन (परमाणु संख्या 6): K=2, L=4 (बाहरी कोश में 4 इलेक्ट्रॉन)
- हाइड्रोजन (परमाणु संख्या 1): K=1 (बाहरी कोश में 1 इलेक्ट्रॉन)
2. सामर्थ्य प्राप्ति की आवश्यकता:
- कार्बन को अष्टक (8 इलेक्ट्रॉन) पूरा करने के लिए 4 और इलेक्ट्रॉन चाहिए
- हाइड्रोजन को द्विक (2 इलेक्ट्रॉन) पूरा करने के लिए 1 और इलेक्ट्रॉन चाहिए
3. इलेक्ट्रॉन साझेदारी:
- एक कार्बन परमाणु चार हाइड्रोजन परमाणुओं के साथ चार इलेक्ट्रॉन युग्मों की साझेदारी करता है
- प्रत्येक C-H बंध एक इलेक्ट्रॉन युग्म (कार्बन का 1 इलेक्ट्रॉन + हाइड्रोजन का 1 इलेक्ट्रॉन) से बनता है
4. परिणाम:
- कार्बन: अपने 4 इलेक्ट्रॉन + हाइड्रोजन के 4 इलेक्ट्रॉन = 8 इलेक्ट्रॉन (अष्टक पूरा)
- प्रत्येक हाइड्रोजन: अपना 1 इलेक्ट्रॉन + कार्बन का 1 इलेक्ट्रॉन = 2 इलेक्ट्रॉन (द्विक पूरा)
5. संरचना:
H
|
H-C-H
|
H
CH₄ में चार सहसंयोजी C-H बंध बनते हैं और अणु चतुष्फलकीय आकृति का होता है।
23. हीरा और ग्रेफाइट की संरचना एवं गुणों में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
नोट: दोनों कार्बन के अपररूप हैं लेकिन संरचना भिन्न होने के कारण उनके गुणधर्म पूरी तरह भिन्न हैं।
| विशेषता | हीरा | ग्रेफाइट |
|---|---|---|
| संरचना | प्रत्येक कार्बन परमाणु चार अन्य कार्बन परमाणुओं के साथ सहसंयोजी बंध बनाता है, जिससे एक मजबूत त्रि-आयामी जालक संरचना बनती है। सभी बंध एकल बंध होते हैं (sp³ संकरण)। | प्रत्येक कार्बन परमाणु तीन अन्य कार्बन परमाणुओं के साथ एक ही तल में जुड़ा होता है, जिससे षट्कोणीय परतें बनती हैं। परतें दुर्बल वान्डरवाल्स बलों द्वारा जुड़ी होती हैं। कार्बन sp² संकरित होता है और प्रत्येक परमाणु से एक मुक्त इलेक्ट्रॉन बच जाता है। |
| कठोरता | अत्यंत कठोर (प्रकृति का सबसे कठोर पदार्थ, मोह्स पैमाने पर 10)। | मुलायम और फिसलनदार, क्योंकि परतें आसानी से फिसल सकती हैं। |
| विद्युत चालकता | कुचालक (सभी इलेक्ट्रॉन बंधन में बंधे हैं, कोई मुक्त इलेक्ट्रॉन नहीं)। | सुचालक (एक मुक्त इलेक्ट्रॉन प्रति परमाणु जो परतों के बीच चल सकता है)। |
| ऊष्मा चालकता | अत्यधिक उच्च (कमरे के ताप पर सबसे अधिक ऊष्मा चालक)। | अच्छी ऊष्मा चालकता। |
| घनत्व | 3.51 g/cm³ | 2.26 g/cm³ |
| रंग एवं पारदर्शिता | रंगहीन, पारदर्शी | काला, अपारदर्शी |
| उपयोग | आभूषण, काटने और पॉलिश करने के औजार, उच्च तापमान विंडोज, ड्रिलिंग बिट्स। | पेंसिल की लीड, इलेक्ट्रोड, स्नेहक, परमाणु रिएक्टरों में मंदक, विद्युत मोटरों के ब्रश। |
| दहन | वायु में 800°C पर दहन कर CO₂ बनाता है। | वायु में दहन कर CO₂ बनाता है। |
नोट: दोनों कार्बन के अपररूप हैं लेकिन संरचना भिन्न होने के कारण उनके गुणधर्म पूरी तरह भिन्न हैं।
24. संरचनात्मक समावयवता क्या है? ब्यूटेन (C₄H₁₀) के समावयवों की संरचना बनाकर समझाइए।
उत्तर:
संरचनात्मक समावयवता: वे कार्बनिक यौगिक जिनका आणविक सूत्र समान होता है लेकिन परमाणुओं की व्यवस्था (संरचना) भिन्न होती है, संरचनात्मक समावयव कहलाते हैं। यह गुण कार्बन यौगिकों में श्रृंखलन के कारण पाया जाता है।
ब्यूटेन (C₄H₁₀) के दो संरचनात्मक समावयव:
1. n-ब्यूटेन (सामान्य ब्यूटेन या ब्यूटेन):
- सभी चार कार्बन परमाणु एक सीधी श्रृंखला में व्यवस्थित होते हैं
- संरचनात्मक सूत्र: CH₃-CH₂-CH₂-CH₃
- क्वथनांक: -0.5°C
- संरचना:
2. आइसोब्यूटेन (2-मेथिलप्रोपेन):
- कार्बन परमाणुओं की शाखित श्रृंखला होती है
- संरचनात्मक सूत्र: CH₃-CH(CH₃)-CH₃
- क्वथनांक: -11.7°C
- संरचना:
महत्वपूर्ण बिंदु:
- दोनों का आणविक सूत्र C₄H₁₀ समान है
- दोनों के भौतिक गुण (क्वथनांक, गलनांक) भिन्न हैं
- दोनों के रासायनिक गुण समान हैं
- यह श्रृंखलन का एक उत्कृष्ट उदाहरण है
समावयवों के प्रकार:
1. श्रृंखला समावयवता
2. स्थान समावयवता
3. प्रकार्यात्मक समूह समावयवता
4. त्रिविम समावयवता
संरचनात्मक समावयवता: वे कार्बनिक यौगिक जिनका आणविक सूत्र समान होता है लेकिन परमाणुओं की व्यवस्था (संरचना) भिन्न होती है, संरचनात्मक समावयव कहलाते हैं। यह गुण कार्बन यौगिकों में श्रृंखलन के कारण पाया जाता है।
ब्यूटेन (C₄H₁₀) के दो संरचनात्मक समावयव:
1. n-ब्यूटेन (सामान्य ब्यूटेन या ब्यूटेन):
- सभी चार कार्बन परमाणु एक सीधी श्रृंखला में व्यवस्थित होते हैं
- संरचनात्मक सूत्र: CH₃-CH₂-CH₂-CH₃
- क्वथनांक: -0.5°C
- संरचना:
H H H H
| | | |
H-C-C-C-C-H
| | | |
H H H H
2. आइसोब्यूटेन (2-मेथिलप्रोपेन):
- कार्बन परमाणुओं की शाखित श्रृंखला होती है
- संरचनात्मक सूत्र: CH₃-CH(CH₃)-CH₃
- क्वथनांक: -11.7°C
- संरचना:
H
|
C-H
|
H-C-C-C-H
| |
H H
महत्वपूर्ण बिंदु:
- दोनों का आणविक सूत्र C₄H₁₀ समान है
- दोनों के भौतिक गुण (क्वथनांक, गलनांक) भिन्न हैं
- दोनों के रासायनिक गुण समान हैं
- यह श्रृंखलन का एक उत्कृष्ट उदाहरण है
समावयवों के प्रकार:
1. श्रृंखला समावयवता
2. स्थान समावयवता
3. प्रकार्यात्मक समूह समावयवता
4. त्रिविम समावयवता
25. समजातीय श्रेणी से आप क्या समझते हैं? एल्केन समजातीय श्रेणी के पहले छह सदस्यों के नाम, सूत्र और संरचना सारणीबद्ध कीजिए।
उत्तर:
समजातीय श्रेणी: कार्बनिक यौगिकों की एक श्रृंखला जिसमें:
1. सभी सदस्यों में एक ही प्रकार्यात्मक समूह होता है
2. क्रमागत सदस्यों के बीच -CH₂- समूह (14 आणविक द्रव्यमान इकाई) का अंतर होता है
3. सभी सदस्यों के रासायनिक गुण समान होते हैं
4. भौतिक गुण (जैसे क्वथनांक, गलनांक) क्रमबद्ध तरीके से बदलते हैं
एल्केन समजातीय श्रेणी: (सामान्य सूत्र: CₙH₂ₙ₊₂)
समजातीय श्रेणी की विशेषताएँ:
1. क्रमागत सदस्यों के बीच -CH₂- का अंतर होता है
2. आणविक द्रव्यमान में 14 u का अंतर होता है
3. क्वथनांक और गलनांक श्रृंखला में ऊपर जाने पर बढ़ते हैं
4. सभी सदस्यों की रासायनिक अभिक्रियाएँ समान होती हैं
5. सभी में एक ही प्रकार्यात्मक समूह होता है
अन्य समजातीय श्रेणियाँ:
- एल्कीन: CₙH₂ₙ (द्वि-बंध वाले)
- एल्काइन: CₙH₂ₙ₋₂ (त्रि-बंध वाले)
- ऐल्कोहल: CₙH₂ₙ₊₁OH
- कार्बोक्सिलिक अम्ल: CₙH₂ₙ₊₁COOH
समजातीय श्रेणी: कार्बनिक यौगिकों की एक श्रृंखला जिसमें:
1. सभी सदस्यों में एक ही प्रकार्यात्मक समूह होता है
2. क्रमागत सदस्यों के बीच -CH₂- समूह (14 आणविक द्रव्यमान इकाई) का अंतर होता है
3. सभी सदस्यों के रासायनिक गुण समान होते हैं
4. भौतिक गुण (जैसे क्वथनांक, गलनांक) क्रमबद्ध तरीके से बदलते हैं
एल्केन समजातीय श्रेणी: (सामान्य सूत्र: CₙH₂ₙ₊₂)
| कार्बन परमाणुओं की संख्या (n) | नाम | आणविक सूत्र | संरचनात्मक सूत्र | आणविक द्रव्यमान (u) | क्वथनांक (°C) |
|---|---|---|---|---|---|
| 1 | मेथेन | CH₄ | CH₄ | 16 | -161.5 |
| 2 | एथेन | C₂H₆ | CH₃-CH₃ | 30 | -88.6 |
| 3 | प्रोपेन | C₃H₈ | CH₃-CH₂-CH₃ | 44 | -42.1 |
| 4 | ब्यूटेन | C₄H₁₀ | CH₃-(CH₂)₂-CH₃ | 58 | -0.5 |
| 5 | पेंटेन | C₅H₁₂ | CH₃-(CH₂)₃-CH₃ | 72 | 36.1 |
| 6 | हेक्सेन | C₆H₁₄ | CH₃-(CH₂)₄-CH₃ | 86 | 68.7 |
समजातीय श्रेणी की विशेषताएँ:
1. क्रमागत सदस्यों के बीच -CH₂- का अंतर होता है
2. आणविक द्रव्यमान में 14 u का अंतर होता है
3. क्वथनांक और गलनांक श्रृंखला में ऊपर जाने पर बढ़ते हैं
4. सभी सदस्यों की रासायनिक अभिक्रियाएँ समान होती हैं
5. सभी में एक ही प्रकार्यात्मक समूह होता है
अन्य समजातीय श्रेणियाँ:
- एल्कीन: CₙH₂ₙ (द्वि-बंध वाले)
- एल्काइन: CₙH₂ₙ₋₂ (त्रि-बंध वाले)
- ऐल्कोहल: CₙH₂ₙ₊₁OH
- कार्बोक्सिलिक अम्ल: CₙH₂ₙ₊₁COOH
26. कार्बन यौगिकों के नामकरण की IUPAC पद्धति के मुख्य नियम लिखिए तथा CH₃CH₂COOH और CH₃COCH₃ के नाम बताइए।
उत्तर:
IUPAC (International Union of Pure and Applied Chemistry) नामकरण पद्धति के मुख्य नियम:
1. सबसे लंबी कार्बन श्रृंखला का चयन: यौगिक में उपस्थित सबसे लंबी कार्बन श्रृंखला का चयन करें। यदि दो समान लंबाई की श्रृंखलाएँ हों तो अधिक प्रतिस्थापी वाली श्रृंखला चुनें।
2. कार्बन परमाणुओं का क्रमांकन: कार्बन परमाणुओं को उस तरफ से क्रमांक दें जहाँ से प्रकार्यात्मक समूह, द्वि-बंध, त्रि-बंध या प्रतिस्थापी को निम्नतम संख्या मिले।
3. प्रकार्यात्मक समूह की पहचान: यौगिक में उपस्थित प्रकार्यात्मक समूह की पहचान करें और उसके अनुसार मूल नाम में उपयुक्त प्रत्यय जोड़ें:
- एल्केन → -ane
- एल्कीन → -ene
- एल्काइन → -yne
- ऐल्कोहल → -ol
- एल्डिहाइड → -al
- कीटोन → -one
- कार्बोक्सिलिक अम्ल → -oic acid
4. प्रतिस्थापियों का नामकरण: प्रतिस्थापी या शाखा का नाम और स्थान उपसर्ग के रूप में मूल नाम से पहले लिखें:
- CH₃- → मेथिल
- C₂H₅- → एथिल
- Cl- → क्लोरो
- Br- → ब्रोमो
5. द्वि/त्रि-बंध का स्थान: द्वि-बंध या त्रि-बंध की स्थिति को क्रमांक द्वारा दर्शाएँ।
6. एक से अधिक समान प्रतिस्थापी: एक से अधिक समान प्रतिस्थापी होने पर di-, tri-, tetra- आदि उपसर्गों का प्रयोग करें।
नामकरण उदाहरण:
1. CH₃CH₂COOH:
- सबसे लंबी श्रृंखला: 3 कार्बन (प्रोपेन)
- प्रकार्यात्मक समूह: -COOH (कार्बोक्सिलिक अम्ल)
- प्रत्यय: प्रोपेन + oic acid = प्रोपेनोइक अम्ल
- IUPAC नाम: प्रोपेनोइक अम्ल (सामान्य नाम: प्रोपियोनिक अम्ल)
2. CH₃COCH₃:
- सबसे लंबी श्रृंखला: 3 कार्बन (प्रोपेन)
- प्रकार्यात्मक समूह: >C=O (कीटोन समूह) दूसरे कार्बन पर
- प्रत्यय: प्रोपेन + one = प्रोपेनोन
- IUPAC नाम: प्रोपेनोन (सामान्य नाम: एसीटोन या डाइमेथिल कीटोन)
अतिरिक्त उदाहरण:
- CH₃CH₂CH₂OH: प्रोपेन-1-ऑल या प्रोपेनॉल
- CH₃CH=CH₂: प्रोपेन-1-ईन
- CH₃CH₂CHO: प्रोपेनॉल
- CH₃CH₂CH₂Cl: 1-क्लोरोप्रोपेन
IUPAC (International Union of Pure and Applied Chemistry) नामकरण पद्धति के मुख्य नियम:
1. सबसे लंबी कार्बन श्रृंखला का चयन: यौगिक में उपस्थित सबसे लंबी कार्बन श्रृंखला का चयन करें। यदि दो समान लंबाई की श्रृंखलाएँ हों तो अधिक प्रतिस्थापी वाली श्रृंखला चुनें।
2. कार्बन परमाणुओं का क्रमांकन: कार्बन परमाणुओं को उस तरफ से क्रमांक दें जहाँ से प्रकार्यात्मक समूह, द्वि-बंध, त्रि-बंध या प्रतिस्थापी को निम्नतम संख्या मिले।
3. प्रकार्यात्मक समूह की पहचान: यौगिक में उपस्थित प्रकार्यात्मक समूह की पहचान करें और उसके अनुसार मूल नाम में उपयुक्त प्रत्यय जोड़ें:
- एल्केन → -ane
- एल्कीन → -ene
- एल्काइन → -yne
- ऐल्कोहल → -ol
- एल्डिहाइड → -al
- कीटोन → -one
- कार्बोक्सिलिक अम्ल → -oic acid
4. प्रतिस्थापियों का नामकरण: प्रतिस्थापी या शाखा का नाम और स्थान उपसर्ग के रूप में मूल नाम से पहले लिखें:
- CH₃- → मेथिल
- C₂H₅- → एथिल
- Cl- → क्लोरो
- Br- → ब्रोमो
5. द्वि/त्रि-बंध का स्थान: द्वि-बंध या त्रि-बंध की स्थिति को क्रमांक द्वारा दर्शाएँ।
6. एक से अधिक समान प्रतिस्थापी: एक से अधिक समान प्रतिस्थापी होने पर di-, tri-, tetra- आदि उपसर्गों का प्रयोग करें।
नामकरण उदाहरण:
1. CH₃CH₂COOH:
- सबसे लंबी श्रृंखला: 3 कार्बन (प्रोपेन)
- प्रकार्यात्मक समूह: -COOH (कार्बोक्सिलिक अम्ल)
- प्रत्यय: प्रोपेन + oic acid = प्रोपेनोइक अम्ल
- IUPAC नाम: प्रोपेनोइक अम्ल (सामान्य नाम: प्रोपियोनिक अम्ल)
2. CH₃COCH₃:
- सबसे लंबी श्रृंखला: 3 कार्बन (प्रोपेन)
- प्रकार्यात्मक समूह: >C=O (कीटोन समूह) दूसरे कार्बन पर
- प्रत्यय: प्रोपेन + one = प्रोपेनोन
- IUPAC नाम: प्रोपेनोन (सामान्य नाम: एसीटोन या डाइमेथिल कीटोन)
अतिरिक्त उदाहरण:
- CH₃CH₂CH₂OH: प्रोपेन-1-ऑल या प्रोपेनॉल
- CH₃CH=CH₂: प्रोपेन-1-ईन
- CH₃CH₂CHO: प्रोपेनॉल
- CH₃CH₂CH₂Cl: 1-क्लोरोप्रोपेन
27. कार्बन यौगिकों की दहन अभिक्रिया को समझाइए। संतृप्त और असंतृप्त हाइड्रोकार्बन के दहन से प्राप्त ज्वाला में क्या अंतर होता है?
उत्तर:
दहन अभिक्रिया: कार्बन यौगिक वायु या ऑक्सीजन की उपस्थिति में जलकर कार्बन डाइऑक्साइड, जल, ऊष्मा और प्रकाश देते हैं। यह एक ऑक्सीकरण अभिक्रिया है जो ऊष्माक्षेपी होती है।
दहन के उदाहरण:
1. कार्बन का दहन:
C(s) + O₂(g) → CO₂(g) + ऊष्मा + प्रकाश
2. मेथेन का दहन (पूर्ण दहन):
CH₄(g) + 2O₂(g) → CO₂(g) + 2H₂O(g) + ऊष्मा + प्रकाश
3. मेथेन का अपूर्ण दहन:
2CH₄(g) + 3O₂(g) → 2CO(g) + 4H₂O(g) + ऊष्मा
4. एथेनॉल का दहन:
C₂H₅OH(l) + 3O₂(g) → 2CO₂(g) + 3H₂O(g) + ऊष्मा + प्रकाश
संतृप्त और असंतृप्त हाइड्रोकार्बन के दहन में अंतर:
व्याख्या:
1. संतृप्त हाइड्रोकार्बन: इनमें C:H अनुपात कम होता है (उदा. मेथेन CH₄ में C:H = 1:4)। पर्याप्त ऑक्सीजन में ये पूरी तरह जलकर CO₂ और H₂O देते हैं, जिससे स्वच्छ नीली ज्वाला मिलती है।
2. असंतृप्त हाइड्रोकार्बन: इनमें C:H अनुपात अधिक होता है (उदा. एथीन C₂H₄ में C:H = 1:2)। इनके दहन के दौरान ऑक्सीजन की कमी के कारण कार्बन के छोटे-छोटे कण (कज्जल) बनते हैं जो गर्म होकर पीली चमक देते हैं, इसलिए पीली कज्जली ज्वाला मिलती है।
प्रायोगिक परीक्षण:
1. एक स्पैचुला पर यौगिक लेकर जलाएँ
2. ज्वाला के ऊपर एक ठंडी काँच की प्लेट या चीनी मिट्टी की प्लेट रखें
3. संतृप्त हाइड्रोकार्बन: प्लेट पर कज्जल नहीं जमेगा
4. असंतृप्त हाइड्रोकार्बन: प्लेट पर कज्जल की एक परत जम जाएगी
महत्व: इस अंतर का उपयोग संतृप्त और असंतृप्त हाइड्रोकार्बन की पहचान के लिए किया जाता है।
दहन अभिक्रिया: कार्बन यौगिक वायु या ऑक्सीजन की उपस्थिति में जलकर कार्बन डाइऑक्साइड, जल, ऊष्मा और प्रकाश देते हैं। यह एक ऑक्सीकरण अभिक्रिया है जो ऊष्माक्षेपी होती है।
दहन के उदाहरण:
1. कार्बन का दहन:
C(s) + O₂(g) → CO₂(g) + ऊष्मा + प्रकाश
2. मेथेन का दहन (पूर्ण दहन):
CH₄(g) + 2O₂(g) → CO₂(g) + 2H₂O(g) + ऊष्मा + प्रकाश
3. मेथेन का अपूर्ण दहन:
2CH₄(g) + 3O₂(g) → 2CO(g) + 4H₂O(g) + ऊष्मा
4. एथेनॉल का दहन:
C₂H₅OH(l) + 3O₂(g) → 2CO₂(g) + 3H₂O(g) + ऊष्मा + प्रकाश
संतृप्त और असंतृप्त हाइड्रोकार्बन के दहन में अंतर:
| पैरामीटर | संतृप्त हाइड्रोकार्बन (एल्केन) | असंतृप्त हाइड्रोकार्बन (एल्कीन/एल्काइन) |
|---|---|---|
| ज्वाला का रंग | नीली और स्वच्छ ज्वाला | पीली, कज्जली और धुआँदार ज्वाला |
| ज्वाला की स्वच्छता | स्वच्छ (कम धुआँ) | अस्वच्छ (अधिक धुआँ) |
| दहन की पूर्णता | पर्याप्त ऑक्सीजन में पूर्ण दहन | अपूर्ण दहन की प्रवृत्ति अधिक |
| कार्बन कणों का निर्माण | कम या नहीं के बराबर | अधिक मात्रा में कज्जल (कार्बन कण) |
| ऊष्मा उत्पादन | अधिक ऊष्मा | तुलनात्मक रूप से कम ऊष्मा |
| कारण | कार्बन की प्रतिशत मात्रा कम, C:H अनुपात कम | कार्बन की प्रतिशत मात्रा अधिक, C:H अनुपात अधिक |
| परीक्षण | स्वच्छ ज्वाला, काँच की प्लेट पर कज्जल नहीं | धुआँदार ज्वाला, काँच की प्लेट पर कज्जल जमा होता है |
व्याख्या:
1. संतृप्त हाइड्रोकार्बन: इनमें C:H अनुपात कम होता है (उदा. मेथेन CH₄ में C:H = 1:4)। पर्याप्त ऑक्सीजन में ये पूरी तरह जलकर CO₂ और H₂O देते हैं, जिससे स्वच्छ नीली ज्वाला मिलती है।
2. असंतृप्त हाइड्रोकार्बन: इनमें C:H अनुपात अधिक होता है (उदा. एथीन C₂H₄ में C:H = 1:2)। इनके दहन के दौरान ऑक्सीजन की कमी के कारण कार्बन के छोटे-छोटे कण (कज्जल) बनते हैं जो गर्म होकर पीली चमक देते हैं, इसलिए पीली कज्जली ज्वाला मिलती है।
प्रायोगिक परीक्षण:
1. एक स्पैचुला पर यौगिक लेकर जलाएँ
2. ज्वाला के ऊपर एक ठंडी काँच की प्लेट या चीनी मिट्टी की प्लेट रखें
3. संतृप्त हाइड्रोकार्बन: प्लेट पर कज्जल नहीं जमेगा
4. असंतृप्त हाइड्रोकार्बन: प्लेट पर कज्जल की एक परत जम जाएगी
महत्व: इस अंतर का उपयोग संतृप्त और असंतृप्त हाइड्रोकार्बन की पहचान के लिए किया जाता है।
28. ऑक्सीकरण अभिक्रिया से आप क्या समझते हैं? एथेनॉल के ऑक्सीकरण से एथेनॉइक अम्ल बनने की अभिक्रिया को समझाइए।
उत्तर:
ऑक्सीकरण अभिक्रिया: वह रासायनिक अभिक्रिया जिसमें:
1. किसी पदार्थ में ऑक्सीजन की वृद्धि होती है
2. किसी पदार्थ से हाइड्रोजन का ह्रास (निकलना) होता है
3. किसी पदार्थ के ऑक्सीकरण अंक में वृद्धि होती है
ऑक्सीकारक: वे पदार्थ जो दूसरे पदार्थों को ऑक्सीकृत करते हैं (ऑक्सीजन देते हैं) और स्वयं अपचयित हो जाते हैं। सामान्य ऑक्सीकारक: KMnO₄ (पोटैशियम परमैंगनेट), K₂Cr₂O₇ (पोटैशियम डाइक्रोमेट), O₂, O₃, HNO₃ आदि।
एथेनॉल का एथेनॉइक अम्ल में ऑक्सीकरण:
अभिक्रिया:
CH₃-CH₂-OH (एथेनॉल) →[ऑक्सीकारक]→ CH₃-COOH (एथेनॉइक अम्ल)
विस्तृत प्रक्रिया:
1. प्रथम चरण (एथेनॉल से एथेनॉल):
CH₃CH₂OH →[ऑक्सीकारक]→ CH₃CHO (एथेनॉल)
यहाँ प्राथमिक ऐल्कोहल ऑक्सीकृत होकर ऐल्डिहाइड बनाता है।
2. द्वितीय चरण (एथेनॉल से एथेनॉइक अम्ल):
CH₃CHO →[ऑक्सीकारक]→ CH₃COOH (एथेनॉइक अम्ल)
यहाँ ऐल्डिहाइड ऑक्सीकृत होकर कार्बोक्सिलिक अम्ल बनाता है।
पूर्ण अभिक्रिया:
CH₃CH₂OH →[KMnO₄/K₂Cr₂O₇]→ CH₃COOH + H₂O
प्रयोगशाला विधि:
1. उपकरण: राउंड बॉटम फ्लास्क, कंडेन्सर, जल ऊष्मक
2. अभिकर्मक: एथेनॉल, अम्लीकृत K₂Cr₂O₇ विलयन
3. विधि:
- एथेनॉल को अम्लीकृत K₂Cr₂O₇ विलयन के साथ गर्म करें
- K₂Cr₂O₇ का नारंगी रंग हरा हो जाता है (Cr⁶⁺ → Cr³⁺)
- उत्पाद में एथेनॉइक अम्ल की तीखी गंध आती है
रासायनिक परिवर्तन:
-OH समूह → -CHO समूह → -COOH समूह
ऑक्सीजन की मात्रा: बढ़ती है (एथेनॉल में 1 O, एथेनॉइक अम्ल में 2 O)
हाइड्रोजन की मात्रा: घटती है (एथेनॉल में 6 H, एथेनॉइक अम्ल में 4 H)
ऑक्सीकारकों की भूमिका:
1. क्षारीय KMnO₄: गुलाबी रंग का, ऑक्सीकरण पर रंगहीन हो जाता है
2. अम्लीकृत K₂Cr₂O₇: नारंगी रंग का, ऑक्सीकरण पर हरा हो जाता है
समीकरण:
3CH₃CH₂OH + 2K₂Cr₂O₇ + 8H₂SO₄ → 3CH₃COOH + 2Cr₂(SO₄)₃ + 2K₂SO₄ + 11H₂O
महत्व:
1. यह प्राथमिक ऐल्कोहल की विशेषता है
2. द्वितीयक ऐल्कोहल कीटोन देते हैं
3. तृतीयक ऐल्कोहल आसानी से ऑक्सीकृत नहीं होते
4. इस अभिक्रिया का उपयोग शराब की मात्रा जाँचने में होता है
पहचान परीक्षण:
1. ऑक्सीकरण के बाद उत्पाद NaHCO₃ के साथ CO₂ गैस देगा
2. नीले लिटमस को लाल करेगा
3. सिरके जैसी तीखी गंध आएगी
ऑक्सीकरण अभिक्रिया: वह रासायनिक अभिक्रिया जिसमें:
1. किसी पदार्थ में ऑक्सीजन की वृद्धि होती है
2. किसी पदार्थ से हाइड्रोजन का ह्रास (निकलना) होता है
3. किसी पदार्थ के ऑक्सीकरण अंक में वृद्धि होती है
ऑक्सीकारक: वे पदार्थ जो दूसरे पदार्थों को ऑक्सीकृत करते हैं (ऑक्सीजन देते हैं) और स्वयं अपचयित हो जाते हैं। सामान्य ऑक्सीकारक: KMnO₄ (पोटैशियम परमैंगनेट), K₂Cr₂O₇ (पोटैशियम डाइक्रोमेट), O₂, O₃, HNO₃ आदि।
एथेनॉल का एथेनॉइक अम्ल में ऑक्सीकरण:
अभिक्रिया:
CH₃-CH₂-OH (एथेनॉल) →[ऑक्सीकारक]→ CH₃-COOH (एथेनॉइक अम्ल)
विस्तृत प्रक्रिया:
1. प्रथम चरण (एथेनॉल से एथेनॉल):
CH₃CH₂OH →[ऑक्सीकारक]→ CH₃CHO (एथेनॉल)
यहाँ प्राथमिक ऐल्कोहल ऑक्सीकृत होकर ऐल्डिहाइड बनाता है।
2. द्वितीय चरण (एथेनॉल से एथेनॉइक अम्ल):
CH₃CHO →[ऑक्सीकारक]→ CH₃COOH (एथेनॉइक अम्ल)
यहाँ ऐल्डिहाइड ऑक्सीकृत होकर कार्बोक्सिलिक अम्ल बनाता है।
पूर्ण अभिक्रिया:
CH₃CH₂OH →[KMnO₄/K₂Cr₂O₇]→ CH₃COOH + H₂O
प्रयोगशाला विधि:
1. उपकरण: राउंड बॉटम फ्लास्क, कंडेन्सर, जल ऊष्मक
2. अभिकर्मक: एथेनॉल, अम्लीकृत K₂Cr₂O₇ विलयन
3. विधि:
- एथेनॉल को अम्लीकृत K₂Cr₂O₇ विलयन के साथ गर्म करें
- K₂Cr₂O₇ का नारंगी रंग हरा हो जाता है (Cr⁶⁺ → Cr³⁺)
- उत्पाद में एथेनॉइक अम्ल की तीखी गंध आती है
रासायनिक परिवर्तन:
-OH समूह → -CHO समूह → -COOH समूह
ऑक्सीजन की मात्रा: बढ़ती है (एथेनॉल में 1 O, एथेनॉइक अम्ल में 2 O)
हाइड्रोजन की मात्रा: घटती है (एथेनॉल में 6 H, एथेनॉइक अम्ल में 4 H)
ऑक्सीकारकों की भूमिका:
1. क्षारीय KMnO₄: गुलाबी रंग का, ऑक्सीकरण पर रंगहीन हो जाता है
2. अम्लीकृत K₂Cr₂O₇: नारंगी रंग का, ऑक्सीकरण पर हरा हो जाता है
समीकरण:
3CH₃CH₂OH + 2K₂Cr₂O₇ + 8H₂SO₄ → 3CH₃COOH + 2Cr₂(SO₄)₃ + 2K₂SO₄ + 11H₂O
महत्व:
1. यह प्राथमिक ऐल्कोहल की विशेषता है
2. द्वितीयक ऐल्कोहल कीटोन देते हैं
3. तृतीयक ऐल्कोहल आसानी से ऑक्सीकृत नहीं होते
4. इस अभिक्रिया का उपयोग शराब की मात्रा जाँचने में होता है
पहचान परीक्षण:
1. ऑक्सीकरण के बाद उत्पाद NaHCO₃ के साथ CO₂ गैस देगा
2. नीले लिटमस को लाल करेगा
3. सिरके जैसी तीखी गंध आएगी
29. संकलन अभिक्रिया (हाइड्रोजनीकरण) क्या है? इसके औद्योगिक अनुप्रयोग का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
संकलन अभिक्रिया (हाइड्रोजनीकरण): वह रासायनिक अभिक्रिया जिसमें असंतृप्त हाइड्रोकार्बन (एल्कीन या एल्काइन) में उत्प्रेरक (निकल, पैलेडियम, प्लेटिनम) की उपस्थिति में हाइड्रोजन गैस मिलाकर संतृप्त हाइड्रोकार्बन बनाया जाता है।
सामान्य समीकरण:
असंतृप्त हाइड्रोकार्बन + H₂ →[उत्प्रेरक]→ संतृप्त हाइड्रोकार्बन
उदाहरण:
1. एथीन का हाइड्रोजनीकरण:
CH₂=CH₂ + H₂ →[Ni उत्प्रेरक, 200°C]→ CH₃-CH₃
(एथीन) + (हाइड्रोजन) → (एथेन)
2. एथाइन का हाइड्रोजनीकरण:
HC≡CH + 2H₂ →[उत्प्रेरक]→ CH₃-CH₃
(एथाइन) + (हाइड्रोजन) → (एथेन)
उत्प्रेरक:
1. निकल (Ni): सबसे सामान्य, सस्ता, 200-300°C ताप पर
2. पैलेडियम (Pd): अधिक सक्रिय, कम ताप पर कार्य करता है
3. प्लेटिनम (Pt): बहुत सक्रिय लेकिन महँगा
औद्योगिक अनुप्रयोग:
1. वनस्पति घी (वनस्पति तेलों का हाइड्रोजनीकरण):
- यह हाइड्रोजनीकरण का सबसे महत्वपूर्ण औद्योगिक उपयोग है
- वनस्पति तेल (मूंगफली, सोयाबीन, कपास के बीज का तेल) असंतृप्त वसा अम्लों के ग्लिसराइड होते हैं
- इनमें द्वि-बंध होते हैं जो हाइड्रोजनीकरण के लिए सक्रिय स्थल प्रदान करते हैं
- प्रक्रिया:
वनस्पति तेल + H₂ →[Ni उत्प्रेरक, 200°C, 5-10 atm]→ वनस्पति घी
- लाभ:
• तरल तेल को ठोस/अर्ध-ठोस घी में बदलना
• भंडारण जीवन बढ़ाना
• खाना पकाने के गुणों में सुधार
2. मार्जरीन उत्पादन:
- वनस्पति तेलों के आंशिक हाइड्रोजनीकरण से मार्जरीन बनती है
- यह मक्खन का सस्ता विकल्प है
3. पेट्रोरसायन उद्योग:
- विभिन्न कार्बनिक रसायनों और विलायकों के उत्पादन में
- गैसोलीन के ऑक्टेन मान में सुधार के लिए
4. अमोनिया संश्लेषण (हैबर प्रक्रम):
- N₂ + 3H₂ →[Fe उत्प्रेरक, 450°C, 200 atm]→ 2NH₃
- यह भी एक प्रकार की हाइड्रोजनीकरण अभिक्रिया है
5. वसा और तेल उद्योग:
- खाद्य तेलों के गुणों को सुधारने के लिए
- ट्रांस वसा के निर्माण में (हालाँकि यह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है)
6. फार्मास्यूटिकल उद्योग:
- दवाओं के संश्लेषण में
- विटामिन और हार्मोन के उत्पादन में
7. प्लास्टिक उद्योग:
- पॉलीमर और प्लास्टिक के निर्माण में
प्रक्रिया की स्थितियाँ:
1. ताप: 150-300°C
2. दाब: 5-10 atm (वनस्पति तेलों के लिए)
3. उत्प्रेरक: निकल पाउडर या निकल-सिलिका जेल
4. अभिक्रिया पात्र: ऑटोक्लेव या हाइड्रोजनीकरण संयंत्र
स्वास्थ्य पहलू:
1. आंशिक हाइड्रोजनीकरण से ट्रांस वसा बनते हैं जो हृदय रोग का कारण बन सकते हैं
2. पूर्ण हाइड्रोजनीकरण से संतृप्त वसा बनते हैं जो अधिक मात्रा में हानिकारक हो सकते हैं
3. आधुनिक उद्योग में ट्रांस वसा मुक्त उत्पादों की माँग बढ़ रही है
प्रयोगशाला प्रदर्शन:
1. एथीन गैस को निकल उत्प्रेरक के ऊपर से प्रवाहित करें
2. हाइड्रोजन गैस मिलाएँ
3. रंगहीन एथेन गैस प्राप्त होगी
4. ब्रोमीन जल का रंग नहीं बदलेगा (संतृप्त होने के कारण)
महत्व:
1. असंतृप्त यौगिकों को संतृप्त करने की महत्वपूर्ण विधि
2. खाद्य उद्योग में क्रांतिकारी परिवर्तन
3. कार्बनिक संश्लेषण में व्यापक उपयोग
4. ईंधन और ऊर्जा उद्योग में योगदान
संकलन अभिक्रिया (हाइड्रोजनीकरण): वह रासायनिक अभिक्रिया जिसमें असंतृप्त हाइड्रोकार्बन (एल्कीन या एल्काइन) में उत्प्रेरक (निकल, पैलेडियम, प्लेटिनम) की उपस्थिति में हाइड्रोजन गैस मिलाकर संतृप्त हाइड्रोकार्बन बनाया जाता है।
सामान्य समीकरण:
असंतृप्त हाइड्रोकार्बन + H₂ →[उत्प्रेरक]→ संतृप्त हाइड्रोकार्बन
उदाहरण:
1. एथीन का हाइड्रोजनीकरण:
CH₂=CH₂ + H₂ →[Ni उत्प्रेरक, 200°C]→ CH₃-CH₃
(एथीन) + (हाइड्रोजन) → (एथेन)
2. एथाइन का हाइड्रोजनीकरण:
HC≡CH + 2H₂ →[उत्प्रेरक]→ CH₃-CH₃
(एथाइन) + (हाइड्रोजन) → (एथेन)
उत्प्रेरक:
1. निकल (Ni): सबसे सामान्य, सस्ता, 200-300°C ताप पर
2. पैलेडियम (Pd): अधिक सक्रिय, कम ताप पर कार्य करता है
3. प्लेटिनम (Pt): बहुत सक्रिय लेकिन महँगा
औद्योगिक अनुप्रयोग:
1. वनस्पति घी (वनस्पति तेलों का हाइड्रोजनीकरण):
- यह हाइड्रोजनीकरण का सबसे महत्वपूर्ण औद्योगिक उपयोग है
- वनस्पति तेल (मूंगफली, सोयाबीन, कपास के बीज का तेल) असंतृप्त वसा अम्लों के ग्लिसराइड होते हैं
- इनमें द्वि-बंध होते हैं जो हाइड्रोजनीकरण के लिए सक्रिय स्थल प्रदान करते हैं
- प्रक्रिया:
वनस्पति तेल + H₂ →[Ni उत्प्रेरक, 200°C, 5-10 atm]→ वनस्पति घी
- लाभ:
• तरल तेल को ठोस/अर्ध-ठोस घी में बदलना
• भंडारण जीवन बढ़ाना
• खाना पकाने के गुणों में सुधार
2. मार्जरीन उत्पादन:
- वनस्पति तेलों के आंशिक हाइड्रोजनीकरण से मार्जरीन बनती है
- यह मक्खन का सस्ता विकल्प है
3. पेट्रोरसायन उद्योग:
- विभिन्न कार्बनिक रसायनों और विलायकों के उत्पादन में
- गैसोलीन के ऑक्टेन मान में सुधार के लिए
4. अमोनिया संश्लेषण (हैबर प्रक्रम):
- N₂ + 3H₂ →[Fe उत्प्रेरक, 450°C, 200 atm]→ 2NH₃
- यह भी एक प्रकार की हाइड्रोजनीकरण अभिक्रिया है
5. वसा और तेल उद्योग:
- खाद्य तेलों के गुणों को सुधारने के लिए
- ट्रांस वसा के निर्माण में (हालाँकि यह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है)
6. फार्मास्यूटिकल उद्योग:
- दवाओं के संश्लेषण में
- विटामिन और हार्मोन के उत्पादन में
7. प्लास्टिक उद्योग:
- पॉलीमर और प्लास्टिक के निर्माण में
प्रक्रिया की स्थितियाँ:
1. ताप: 150-300°C
2. दाब: 5-10 atm (वनस्पति तेलों के लिए)
3. उत्प्रेरक: निकल पाउडर या निकल-सिलिका जेल
4. अभिक्रिया पात्र: ऑटोक्लेव या हाइड्रोजनीकरण संयंत्र
स्वास्थ्य पहलू:
1. आंशिक हाइड्रोजनीकरण से ट्रांस वसा बनते हैं जो हृदय रोग का कारण बन सकते हैं
2. पूर्ण हाइड्रोजनीकरण से संतृप्त वसा बनते हैं जो अधिक मात्रा में हानिकारक हो सकते हैं
3. आधुनिक उद्योग में ट्रांस वसा मुक्त उत्पादों की माँग बढ़ रही है
प्रयोगशाला प्रदर्शन:
1. एथीन गैस को निकल उत्प्रेरक के ऊपर से प्रवाहित करें
2. हाइड्रोजन गैस मिलाएँ
3. रंगहीन एथेन गैस प्राप्त होगी
4. ब्रोमीन जल का रंग नहीं बदलेगा (संतृप्त होने के कारण)
महत्व:
1. असंतृप्त यौगिकों को संतृप्त करने की महत्वपूर्ण विधि
2. खाद्य उद्योग में क्रांतिकारी परिवर्तन
3. कार्बनिक संश्लेषण में व्यापक उपयोग
4. ईंधन और ऊर्जा उद्योग में योगदान
30. एथेनॉल और एथेनॉइक अम्ल के भौतिक एवं रासायनिक गुणों में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
पहचान परीक्षण:
एथेनॉल के लिए:
1. आयोडोफॉर्म परीक्षण: एथेनॉल + I₂ + NaOH → पीला अवक्षेप (CHI₃)
2. ऑक्सीकरण परीक्षण: एथेनॉल + K₂Cr₂O₇/H⁺ → हरा रंग (Cr³⁺)
3. एस्टरीकरण: एथेनॉल + एसीटिक अम्ल → फलों जैसी सुगंध (एस्टर)
एथेनॉइक अम्ल के लिए:
1. लिटमस परीक्षण: नीला लिटमस लाल हो जाता है
2. सोडियम बाइकार्बोनेट परीक्षण: NaHCO₃ के साथ CO₂ गैस देता है
3. एस्टरीकरण: एथेनॉल के साथ एस्टर बनाता है
4. फेरिक क्लोराइड परीक्षण: बफर रंग का विलयन देता है
महत्वपूर्ण तथ्य:
1. एथेनॉल और एथेनॉइक अम्ल दोनों महत्वपूर्ण कार्बनिक यौगिक हैं
2. एथेनॉल एल्कोहल समूह का प्रतिनिधि है
3. एथेनॉइक अम्ल कार्बोक्सिलिक अम्ल समूह का प्रतिनिधि है
4. दोनों दैनिक जीवन और उद्योगों में व्यापक रूप से उपयोग किए जाते हैं
5. दोनों जल में घुलनशील हैं और हाइड्रोजन बंध बनाते हैं
| गुण/विशेषता | एथेनॉल (C₂H₅OH) | एथेनॉइक अम्ल (CH₃COOH) |
|---|---|---|
| सामान्य नाम | एथिल एल्कोहल, ग्रेन एल्कोहल | एसीटिक अम्ल |
| प्रकार्यात्मक समूह | हाइड्रॉक्सिल (-OH) | कार्बोक्सिल (-COOH) |
| भौतिक अवस्था (कमरे के ताप पर) | रंगहीन द्रव | रंगहीन द्रव |
| गंध | मादक, विशिष्ट एल्कोहली गंध | तीखी, सिरके जैसी गंध |
| स्वाद | जलाने वाला | खट्टा |
| गलनांक | 156 K (-117°C) | 290 K (17°C) |
| क्वथनांक | 351 K (78°C) | 391 K (118°C) |
| जल में विलेयता | पूर्ण रूप से मिश्रणीय (सभी अनुपातों में) | जल में अच्छी तरह घुलनशील |
| अम्लीय/क्षारीय प्रकृति | उदासीन (लिटमस पर कोई प्रभाव नहीं) | दुर्बल अम्ल (नीला लिटमस लाल करता है) |
| pH मान (0.1 M विलयन) | लगभग 7 | लगभग 2.9 |
| सोडियम धातु के साथ अभिक्रिया | हाइड्रोजन गैस मुक्त करता है: 2C₂H₅OH + 2Na → 2C₂H₅ONa + H₂↑ |
हाइड्रोजन गैस मुक्त करता है (अम्लीय H के कारण): 2CH₃COOH + 2Na → 2CH₃COONa + H₂↑ |
| सोडियम हाइड्रॉक्साइड के साथ | अभिक्रिया नहीं (उदासीन) | उदासीनीकरण अभिक्रिया: CH₃COOH + NaOH → CH₃COONa + H₂O |
| सोडियम कार्बोनेट/बाइकार्बोनेट के साथ | कोई अभिक्रिया नहीं | CO₂ गैस मुक्त करता है: 2CH₃COOH + Na₂CO₃ → 2CH₃COONa + H₂O + CO₂↑ CH₃COOH + NaHCO₃ → CH₃COONa + H₂O + CO₂↑ |
| एस्टरीकरण अभिक्रिया | कार्बोक्सिलिक अम्ल के साथ एस्टर बनाता है: C₂H₅OH + CH₃COOH → CH₃COOC₂H₅ + H₂O |
एल्कोहल के साथ एस्टर बनाता है: CH₃COOH + C₂H₅OH → CH₃COOC₂H₅ + H₂O |
| ऑक्सीकरण | ऑक्सीकारकों द्वारा एथेनॉइक अम्ल में ऑक्सीकृत होता है | ऑक्सीकारकों द्वारा आगे ऑक्सीकृत नहीं होता (स्थिर) |
| दहन | जलकर CO₂ और H₂O देता है: C₂H₅OH + 3O₂ → 2CO₂ + 3H₂O |
जलकर CO₂ और H₂O देता है: CH₃COOH + 2O₂ → 2CO₂ + 2H₂O |
| सांद्र H₂SO₄ के साथ गर्म करने पर | निर्जलीकरण से एथीन बनाता है: C₂H₅OH →[सांद्र H₂SO₄, 443K]→ C₂H₄ + H₂O |
कोई निर्जलीकरण नहीं होता |
| PCl₅ के साथ अभिक्रिया | क्लोरोएथेन बनाता है: C₂H₅OH + PCl₅ → C₂H₅Cl + POCl₃ + HCl |
एसिटिल क्लोराइड बनाता है: CH₃COOH + PCl₅ → CH₃COCl + POCl₃ + HCl |
| हाइड्रोजन बंधन | अन्तराअणुक हाइड्रोजन बंध बनाता है | द्विलक बनाता है (दो अणु हाइड्रोजन बंध द्वारा जुड़े) |
| आयनीकरण | आयनीकृत नहीं होता | दुर्बल रूप से आयनीकृत होता है: CH₃COOH ⇌ CH₃COO⁻ + H⁺ |
| उपयोग | विलायक, ईंधन, पेय, औषधि निर्माण, कीटाणुनाशक, परफ्यूम | सिरका, परिरक्षक, रंजक उद्योग, दवा निर्माण, एसीटेट फाइबर |
| विशेष रूप | परिशुद्ध एल्कोहल (95% एथेनॉल + 5% जल) | ग्लेशियल एसीटिक अम्ल (100% शुद्ध, 17°C पर जमता है) |
| स्वास्थ्य प्रभाव | नशा, यकृत क्षति, निर्भरता | तनु रूप में सुरक्षित, सांद्र रूप में जलन पैदा करता है |
पहचान परीक्षण:
एथेनॉल के लिए:
1. आयोडोफॉर्म परीक्षण: एथेनॉल + I₂ + NaOH → पीला अवक्षेप (CHI₃)
2. ऑक्सीकरण परीक्षण: एथेनॉल + K₂Cr₂O₇/H⁺ → हरा रंग (Cr³⁺)
3. एस्टरीकरण: एथेनॉल + एसीटिक अम्ल → फलों जैसी सुगंध (एस्टर)
एथेनॉइक अम्ल के लिए:
1. लिटमस परीक्षण: नीला लिटमस लाल हो जाता है
2. सोडियम बाइकार्बोनेट परीक्षण: NaHCO₃ के साथ CO₂ गैस देता है
3. एस्टरीकरण: एथेनॉल के साथ एस्टर बनाता है
4. फेरिक क्लोराइड परीक्षण: बफर रंग का विलयन देता है
महत्वपूर्ण तथ्य:
1. एथेनॉल और एथेनॉइक अम्ल दोनों महत्वपूर्ण कार्बनिक यौगिक हैं
2. एथेनॉल एल्कोहल समूह का प्रतिनिधि है
3. एथेनॉइक अम्ल कार्बोक्सिलिक अम्ल समूह का प्रतिनिधि है
4. दोनों दैनिक जीवन और उद्योगों में व्यापक रूप से उपयोग किए जाते हैं
5. दोनों जल में घुलनशील हैं और हाइड्रोजन बंध बनाते हैं
31. साबुन की सफाई प्रक्रिया की क्रियाविधि को मिसेल के निर्माण के साथ समझाइए।
उत्तर:
साबुन की सफाई क्रिया: साबुन की सफाई की क्रिया इसके अणु की द्विध्रुवीय प्रकृति और मिसेल निर्माण पर आधारित है।
साबुन अणु की संरचना:
1. जलरागी सिरा (आयनिक सिरा):
- यह -COO⁻Na⁺ समूह होता है
- जल के प्रति आकर्षित होता है (हाइड्रोफिलिक)
- ध्रुवीय होता है
2. जलविरागी सिरा (हाइड्रोकार्बन पूँछ):
- यह लंबी हाइड्रोकार्बन श्रृंखला होती है (12-18 कार्बन)
- जल से विरोध करता है (हाइड्रोफोबिक)
- अध्रुवीय होता है
- तेल और ग्रीस के प्रति आकर्षित होता है
मिसेल निर्माण की प्रक्रिया:
1. जल में विलेयता:
- जब साबुन को जल में मिलाया जाता है, तो जलरागी सिरा जल के अणुओं के साथ अन्योन्यक्रिया करता है
- जलविरागी पूँछ जल से दूर भागती है
2. सतह पर व्यवस्था:
- जल की सतह पर साबुन के अणु इस प्रकार व्यवस्थित होते हैं कि जलरागी सिरा जल में और जलविरागी पूँछ हवा में होती है
3. मिसेल निर्माण:
- एक निश्चित सांद्रता (क्रिटिकल मिसेल सांद्रता) पर साबुन के अणु एकत्र होकर गोलाकार संरचनाएँ बनाते हैं
- इन संरचनाओं को मिसेल कहते हैं
- मिसेल में जलविरागी पूँछें अंदर की ओर और जलरागी सिरे बाहर की ओर होते हैं
सफाई की क्रियाविधि:
1. मैल का आसंजन:
- कपड़े या त्वचा पर लगा तैलीय मैल (ग्रीस, धूल) जल में नहीं घुलता
- साबुन का जलविरागी सिरा इस तैलीय मैल के कणों से चिपक जाता है
2. मिसेल में समावेशन:
- मिसेल के केंद्र में तैलीय मैल के कण फँस जाते हैं
- जलरागी सिरा बाहर की ओर जल के साथ अन्योन्यक्रिया करता है
3. पायस निर्माण:
- मिसेल जल में कोलॉइडल विलयन बनाते हैं
- तैलीय मैल का पायस (इमल्शन) बनता है
4. धुलाई और निष्कासन:
- पानी के साथ मिसेल बह जाते हैं
- मैल के कण भी बह जाते हैं
- सतह साफ हो जाती है
चित्रण:
मिसेल के गुण:
1. आकार: 2-10 nm व्यास
2. आकार: गोलाकार, दीर्घवृत्ताकार या छड़ जैसा
3. स्थायित्व: आयन-आयन विकर्षण के कारण स्थायी
4. प्रकाश प्रकीर्णन: टिंडल प्रभाव दिखाते हैं
लाभ:
1. तैलीय मैल को जल में घुलनशील बनाता है
2. पृष्ठ तनाव कम करता है
3. गीला करने की क्षमता बढ़ाता है
4. पायसीकारक का कार्य करता है
प्रायोगिक प्रदर्शन:
1. दो परखनलियों में जल लें
2. दोनों में तेल की बूँद डालें
3. एक में साबुन का घोल मिलाएँ
4. साबुन वाली में तेल पायस बन जाएगा
5. बिना साबुन वाली में तेल अलग परत बनाएगा
महत्व:
1. सफाई का वैज्ञानिक आधार
2. डिटर्जेंट उद्योग का मूल सिद्धांत
3. औद्योगिक और घरेलू सफाई में उपयोग
4. जैविक मेम्ब्रेन के मॉडल के रूप में अध्ययन
साबुन की सफाई क्रिया: साबुन की सफाई की क्रिया इसके अणु की द्विध्रुवीय प्रकृति और मिसेल निर्माण पर आधारित है।
साबुन अणु की संरचना:
1. जलरागी सिरा (आयनिक सिरा):
- यह -COO⁻Na⁺ समूह होता है
- जल के प्रति आकर्षित होता है (हाइड्रोफिलिक)
- ध्रुवीय होता है
2. जलविरागी सिरा (हाइड्रोकार्बन पूँछ):
- यह लंबी हाइड्रोकार्बन श्रृंखला होती है (12-18 कार्बन)
- जल से विरोध करता है (हाइड्रोफोबिक)
- अध्रुवीय होता है
- तेल और ग्रीस के प्रति आकर्षित होता है
मिसेल निर्माण की प्रक्रिया:
1. जल में विलेयता:
- जब साबुन को जल में मिलाया जाता है, तो जलरागी सिरा जल के अणुओं के साथ अन्योन्यक्रिया करता है
- जलविरागी पूँछ जल से दूर भागती है
2. सतह पर व्यवस्था:
- जल की सतह पर साबुन के अणु इस प्रकार व्यवस्थित होते हैं कि जलरागी सिरा जल में और जलविरागी पूँछ हवा में होती है
3. मिसेल निर्माण:
- एक निश्चित सांद्रता (क्रिटिकल मिसेल सांद्रता) पर साबुन के अणु एकत्र होकर गोलाकार संरचनाएँ बनाते हैं
- इन संरचनाओं को मिसेल कहते हैं
- मिसेल में जलविरागी पूँछें अंदर की ओर और जलरागी सिरे बाहर की ओर होते हैं
सफाई की क्रियाविधि:
1. मैल का आसंजन:
- कपड़े या त्वचा पर लगा तैलीय मैल (ग्रीस, धूल) जल में नहीं घुलता
- साबुन का जलविरागी सिरा इस तैलीय मैल के कणों से चिपक जाता है
2. मिसेल में समावेशन:
- मिसेल के केंद्र में तैलीय मैल के कण फँस जाते हैं
- जलरागी सिरा बाहर की ओर जल के साथ अन्योन्यक्रिया करता है
3. पायस निर्माण:
- मिसेल जल में कोलॉइडल विलयन बनाते हैं
- तैलीय मैल का पायस (इमल्शन) बनता है
4. धुलाई और निष्कासन:
- पानी के साथ मिसेल बह जाते हैं
- मैल के कण भी बह जाते हैं
- सतह साफ हो जाती है
चित्रण:
┌─────────────────────────────────────┐
│ जल │
│ ┌──────────────────────┐ │
│ │ मिसेल संरचना │ │
│ │ ┌──────────────┐ │ │
│ │ │ तैलीय मैल │ │ │
│ │ │ का कण │ │ │
│ │ └──────────────┘ │ │
│ │ ↑ │ │
│ │ │ जलविरागी पूँछ │ │
│ │ ↓ │ │
│ │ जलरागी सिरा │ │
│ └──────────────────────┘ │
└─────────────────────────────────────┘
मिसेल के गुण:
1. आकार: 2-10 nm व्यास
2. आकार: गोलाकार, दीर्घवृत्ताकार या छड़ जैसा
3. स्थायित्व: आयन-आयन विकर्षण के कारण स्थायी
4. प्रकाश प्रकीर्णन: टिंडल प्रभाव दिखाते हैं
लाभ:
1. तैलीय मैल को जल में घुलनशील बनाता है
2. पृष्ठ तनाव कम करता है
3. गीला करने की क्षमता बढ़ाता है
4. पायसीकारक का कार्य करता है
प्रायोगिक प्रदर्शन:
1. दो परखनलियों में जल लें
2. दोनों में तेल की बूँद डालें
3. एक में साबुन का घोल मिलाएँ
4. साबुन वाली में तेल पायस बन जाएगा
5. बिना साबुन वाली में तेल अलग परत बनाएगा
महत्व:
1. सफाई का वैज्ञानिक आधार
2. डिटर्जेंट उद्योग का मूल सिद्धांत
3. औद्योगिक और घरेलू सफाई में उपयोग
4. जैविक मेम्ब्रेन के मॉडल के रूप में अध्ययन
32. साबुन और अपमार्जक (डिटरजेंट) में अंतर स्पष्ट कीजिए। कठोर जल में अपमार्जक अधिक प्रभावी क्यों होते हैं?
उत्तर:
कठोर जल में अपमार्जक के प्रभावी होने का कारण:
1. रासायनिक संरचना:
- अपमार्जक के आयनिक सिरे (जैसे सल्फोनेट समूह -SO₃⁻Na⁺) कठोर जल के Ca²⁺ और Mg²⁺ आयनों के साथ अघुलनशील लवण नहीं बनाते
- सल्फोनेट लवण कार्बोक्सिलेट लवणों की तुलना में अधिक घुलनशील होते हैं
2. स्थायित्व:
- अपमार्जक के अणु कठोर जल में भी स्थायी रहते हैं
- मिसेल बनाने की क्षमता बनी रहती है
3. चेलेटिंग प्रभाव:
- कुछ अपमार्जकों में चेलेटिंग एजेंट मिले होते हैं जो कठोर जल के आयनों को बाँध लेते हैं
- STPP (सोडियम ट्राइपॉलीफॉस्फेट) इसका उदाहरण है
4. अम्लीय माध्यम में स्थायित्व:
- अपमार्जक अम्लीय माध्यम में भी प्रभावी रहते हैं
- जबकि साबुन अम्लीय माध्यम में अघुलनशील वसा अम्ल बनाते हैं
प्रायोगिक प्रदर्शन:
उद्देश्य: साबुन और अपमार्जक की कठोर जल में प्रभावशीलता की तुलना
सामग्री:
1. दो परखनलियाँ
2. कठोर जल (CaCl₂ या MgSO₄ का विलयन)
3. साबुन का घोल
4. अपमार्जक का घोल
विधि:
1. दोनों परखनलियों में समान मात्रा में कठोर जल लें
2. एक में साबुन का घोल मिलाएँ
3. दूसरे में अपमार्जक का घोल मिलाएँ
4. दोनों को हिलाएँ
प्रेक्षण:
1. साबुन वाली परखनली:
- कम झाग बनेगा
- सफेद दही जैसा अवक्षेप (स्कम) बनेगा
- सफाई प्रभावी नहीं होगी
2. अपमार्जक वाली परखनली:
- अच्छा झाग बनेगा
- कोई अवक्षेप नहीं बनेगा
- सफाई प्रभावी होगी
आधुनिक विकास:
1. जैव निम्नीकरणीय अपमार्जक: रैखिक ऐल्किल बेंजीन सल्फोनेट (LABS)
2. फॉस्फेट मुक्त अपमार्जक: पर्यावरण संरक्षण के लिए
3. एन्जाइम युक्त अपमार्जक: प्रोटीएज, लाइपेज, एमाइलेज एन्जाइम मिले होते हैं
4. ऑक्सीकरण अपमार्जक: ब्लीचिंग प्रभाव के लिए
महत्व:
1. कठोर जल वाले क्षेत्रों में अपमार्जक का महत्व
2. औद्योगिक सफाई में व्यापक उपयोग
3. विशिष्ट उद्देश्यों के लिए विशेष अपमार्जक
4. पर्यावरण अनुकूल अपमार्जकों का विकास
| आधार | साबुन | अपमार्जक (डिटरजेंट) |
|---|---|---|
| रासायनिक प्रकृति | दीर्घ श्रृंखला वाले वसा अम्लों (कार्बोक्सिलिक अम्ल) के सोडियम या पोटैशियम लवण उदाहरण: सोडियम स्टीयरेट (C₁₇H₃₅COONa) |
दीर्घ श्रृंखला वाले बेंजीन सल्फोनेट या अमोनियम लवण उदाहरण: सोडियम लॉरिल बेंजीन सल्फोनेट |
| कठोर जल में व्यवहार | कैल्शियम और मैग्नीशियम आयनों से क्रिया कर अघुलनशील स्कम (अवक्षेप) बनाते हैं: 2C₁₇H₃₅COONa + Ca²⁺ → (C₁₇H₃₅COO)₂Ca↓ + 2Na⁺ सफाई शक्ति कम हो जाती है, अधिक मात्रा में साबुन की आवश्यकता होती है |
कैल्शियम और मैग्नीशियम आयनों से अघुलनशील पदार्थ नहीं बनाते सफाई शक्ति बनी रहती है, कम मात्रा में प्रभावी |
| अम्लीय जल में व्यवहार | अम्लीय जल में अघुलनशील वसा अम्ल बनाते हैं: C₁₇H₃₅COONa + HCl → C₁₇H₃₅COOH↓ + NaCl |
अम्लीय जल में भी प्रभावी रहते हैं |
| जैव निम्नीकरणीयता | हाँ, जैविक रूप से आसानी से अपघटित हो जाते हैं, पर्यावरण के अनुकूल | कुछ प्रकार के अपमार्जक जैव निम्नीकरणीय नहीं होते, जल प्रदूषण का कारण बन सकते हैं |
| झाग | कठोर जल में कम झाग देते हैं, मुलायम जल में अच्छा झाग | कठोर जल में भी अच्छा झाग देते हैं |
| निर्माण विधि | वनस्पति तेल/वसा + NaOH → साबुन + ग्लिसरॉल (उत्क्रमणीय अभिक्रिया) | पेट्रोरसायनों से संश्लेषित, उत्प्रेरकों की सहायता से |
| लागत | सस्ता | अपेक्षाकृत महँगा |
| उपयोग | नहाने, कपड़े धोने (मुलायम जल में), हाथ धोने | कपड़े धोने, बर्तन साफ करने, शैंपू, टूथपेस्ट, औद्योगिक सफाई |
| पर्यावरणीय प्रभाव | कम हानिकारक, जैविक अपघटन आसान | फॉस्फेट युक्त अपमार्जक यूट्रोफिकेशन का कारण बन सकते हैं |
कठोर जल में अपमार्जक के प्रभावी होने का कारण:
1. रासायनिक संरचना:
- अपमार्जक के आयनिक सिरे (जैसे सल्फोनेट समूह -SO₃⁻Na⁺) कठोर जल के Ca²⁺ और Mg²⁺ आयनों के साथ अघुलनशील लवण नहीं बनाते
- सल्फोनेट लवण कार्बोक्सिलेट लवणों की तुलना में अधिक घुलनशील होते हैं
2. स्थायित्व:
- अपमार्जक के अणु कठोर जल में भी स्थायी रहते हैं
- मिसेल बनाने की क्षमता बनी रहती है
3. चेलेटिंग प्रभाव:
- कुछ अपमार्जकों में चेलेटिंग एजेंट मिले होते हैं जो कठोर जल के आयनों को बाँध लेते हैं
- STPP (सोडियम ट्राइपॉलीफॉस्फेट) इसका उदाहरण है
4. अम्लीय माध्यम में स्थायित्व:
- अपमार्जक अम्लीय माध्यम में भी प्रभावी रहते हैं
- जबकि साबुन अम्लीय माध्यम में अघुलनशील वसा अम्ल बनाते हैं
प्रायोगिक प्रदर्शन:
उद्देश्य: साबुन और अपमार्जक की कठोर जल में प्रभावशीलता की तुलना
सामग्री:
1. दो परखनलियाँ
2. कठोर जल (CaCl₂ या MgSO₄ का विलयन)
3. साबुन का घोल
4. अपमार्जक का घोल
विधि:
1. दोनों परखनलियों में समान मात्रा में कठोर जल लें
2. एक में साबुन का घोल मिलाएँ
3. दूसरे में अपमार्जक का घोल मिलाएँ
4. दोनों को हिलाएँ
प्रेक्षण:
1. साबुन वाली परखनली:
- कम झाग बनेगा
- सफेद दही जैसा अवक्षेप (स्कम) बनेगा
- सफाई प्रभावी नहीं होगी
2. अपमार्जक वाली परखनली:
- अच्छा झाग बनेगा
- कोई अवक्षेप नहीं बनेगा
- सफाई प्रभावी होगी
आधुनिक विकास:
1. जैव निम्नीकरणीय अपमार्जक: रैखिक ऐल्किल बेंजीन सल्फोनेट (LABS)
2. फॉस्फेट मुक्त अपमार्जक: पर्यावरण संरक्षण के लिए
3. एन्जाइम युक्त अपमार्जक: प्रोटीएज, लाइपेज, एमाइलेज एन्जाइम मिले होते हैं
4. ऑक्सीकरण अपमार्जक: ब्लीचिंग प्रभाव के लिए
महत्व:
1. कठोर जल वाले क्षेत्रों में अपमार्जक का महत्व
2. औद्योगिक सफाई में व्यापक उपयोग
3. विशिष्ट उद्देश्यों के लिए विशेष अपमार्जक
4. पर्यावरण अनुकूल अपमार्जकों का विकास
33. कार्बन चक्र और जीवाश्म ईंधन के निर्माण की संक्षिप्त व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
कार्बन चक्र: प्रकृति में कार्बन के विभिन्न रूपों (CO₂, कार्बोनेट, जैवमात्रा, जीवाश्म ईंधन) के बीच निरंतर चलने वाला चक्र जिसमें कार्बन एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित होता रहता है।
कार्बन चक्र के मुख्य घटक:
1. वायुमंडलीय CO₂:
- सांद्रता: 0.03% (415 ppm)
- कार्बन चक्र का प्रमुख भंडार
2. सागरीय भंडार:
- CO₂ का विलयन
- कार्बोनेट और बाइकार्बोनेट लवण
- समुद्री जीवों के कैल्शियम कार्बोनेट खोल
3. स्थलीय भंडार:
- जीवित जीवों में कार्बन (जैवमात्रा)
- मृत जीवों के अवशेष
- मृदा कार्बन
- जीवाश्म ईंधन
कार्बन चक्र की प्रक्रियाएँ:
A. CO₂ का अवशोषण:
1. प्रकाश संश्लेषण:
6CO₂ + 6H₂O + सूर्य का प्रकाश → C₆H₁₂O₆ + 6O₂
- पौधे वायुमंडल से CO₂ लेते हैं
- कार्बोहाइड्रेट बनाते हैं
- कार्बन जैवमात्रा में संचित होता है
2. समुद्री अवशोषण:
- समुद्र वायुमंडलीय CO₂ को अवशोषित करते हैं
- CO₂ + H₂O ⇌ H₂CO₃ ⇌ H⁺ + HCO₃⁻ ⇌ 2H⁺ + CO₃²⁻
B. CO₂ का विमोचन:
1. श्वसन:
C₆H₁₂O₆ + 6O₂ → 6CO₂ + 6H₂O + ऊर्जा
- सभी जीव श्वसन द्वारा CO₂ छोड़ते हैं
2. विघटन:
- सूक्ष्मजीव मृत जीवों को विघटित करते हैं
- कार्बन CO₂ के रूप में मुक्त होता है
3. दहन:
- जीवाश्म ईंधनों के जलने से
- वनों की कटाई और जलने से
4. ज्वालामुखी विस्फोट:
- CO₂ और अन्य गैसें निकलती हैं
5. चूना पत्थर का विघटन:
CaCO₃ + 2HCl → CaCl₂ + H₂O + CO₂
C. दीर्घकालिक भंडारण:
1. जीवाश्म ईंधन निर्माण: लाखों वर्षों में
2. चूना पत्थर निर्माण: समुद्री जीवों के खोलों से
3. कोयला निर्माण: प्राचीन वनस्पति से
जीवाश्म ईंधनों का निर्माण:
1. कोयला का निर्माण:
चरण 1: पीट निर्माण (लगभग 10⁴ वर्ष)
- कार्बोनिफेरस युग (30-35 करोड़ वर्ष पहले)
- विशाल वन, फर्न, देवदार के जंगल
- मृत वनस्पति दलदल में जमा
- आंशिक विघटन, उच्च दाब
- पीट (Peat) बनता है (कार्बन: 60%)
चरण 2: लिग्नाइट निर्माण (लगभग 10⁶ वर्ष)
- पीट पर और अधिक दबाव
- पानी और वाष्पशील पदार्थ निकल जाते हैं
- लिग्नाइट (Lignite) बनता है (कार्बन: 70%)
- नरम, भूरा कोयला
चरण 3: बिटुमिनस कोयला (लगभग 10⁷ वर्ष)
- और अधिक दबाव और ताप
- बिटुमिनस कोयला (Bituminous coal) बनता है (कार्बन: 80-85%)
- सबसे सामान्य प्रकार का कोयला
चरण 4: एन्थ्रासाइट निर्माण (लगभग 10⁸ वर्ष)
- अत्यधिक दबाव और ताप
- एन्थ्रासाइट (Anthracite) बनता है (कार्बन: 90-95%)
- सबसे उच्च कोटि का कोयला
- कठोर, चमकदार, अधिक ऊष्मा मान
2. पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस का निर्माण:
चरण 1: जैविक पदार्थों का संचयन
- 10-20 करोड़ वर्ष पहले
- समुद्री सूक्ष्मजीव (प्लवक, शैवाल)
- मृत जीव समुद्र तल पर जमा
चरण 2: तलछटी परतों में दबाव
- रेत और मिट्टी की परतों से ढक जाना
- उच्च दाब (100-1000 atm)
- उच्च ताप (50-150°C)
चरण 3: केरोजन निर्माण
- बैक्टीरिया द्वारा आंशिक विघटन
- ऑक्सीजन की अनुपस्थिति
- केरोजन (Kerogen) बनता है - जटिल कार्बनिक पदार्थ
चरण 4: तापीय अपघटन (कैटाजेनेसिस)
- केरोजन का तापीय अपघटन
- हाइड्रोकार्बनों का निर्माण
- अपघटन के आधार पर:
• कम ताप: पेट्रोलियम (तरल)
• अधिक ताप: प्राकृतिक गैस (मीथेन)
चरण 5: प्रवास और जाल में फँसना
- हाइड्रोकार्बन चट्टानों में रिसते हैं
- अभेद्य चट्टानों द्वारा रोके जाते हैं
- जाल संरचनाओं में एकत्र होते हैं
- पेट्रोलियम जल पर तैरता है, गैस सबसे ऊपर
जीवाश्म ईंधनों की विशेषताएँ:
1. अनवीकरणीय: लाखों वर्षों में बनते हैं
2. उच्च ऊर्जा घनत्व: प्रति इकाई द्रव्यमान अधिक ऊर्जा
3. कार्बन युक्त: मुख्यतः कार्बन और हाइड्रोजन
4. सीमित भंडार: समाप्त होने वाले
महत्वपूर्ण तथ्य:
1. कोयला मुख्यतः कार्बन, पेट्रोलियम मुख्यतः हाइड्रोकार्बन
2. पेट्रोलियम में सल्फर और नाइट्रोजन भी होते हैं
3. जीवाश्म ईंधनों के दहन से ग्लोबल वार्मिंग
4. वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की आवश्यकता
प्रमुख जीवाश्म ईंधन भंडार:
1. कोयला: चीन, USA, भारत, ऑस्ट्रेलिया, रूस
2. पेट्रोलियम: सऊदी अरब, रूस, USA, ईरान, इराक
3. प्राकृतिक गैस: रूस, ईरान, कतर, USA, सऊदी अरब
भारत में जीवाश्म ईंधन:
1. कोयला: झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल
2. पेट्रोलियम: मुंबई हाई, कृष्णा-गोदावरी बेसिन, असम
3. प्राकृतिक गैस: मुंबई हाई, कृष्णा-गोदावरी बेसिन
महत्व:
1. विश्व ऊर्जा का 80% से अधिक जीवाश्म ईंधनों से
2. औद्योगिक क्रांति का आधार
3. परिवहन, बिजली उत्पादन, उद्योगों में उपयोग
4. अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण घटक
कार्बन चक्र: प्रकृति में कार्बन के विभिन्न रूपों (CO₂, कार्बोनेट, जैवमात्रा, जीवाश्म ईंधन) के बीच निरंतर चलने वाला चक्र जिसमें कार्बन एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित होता रहता है।
कार्बन चक्र के मुख्य घटक:
1. वायुमंडलीय CO₂:
- सांद्रता: 0.03% (415 ppm)
- कार्बन चक्र का प्रमुख भंडार
2. सागरीय भंडार:
- CO₂ का विलयन
- कार्बोनेट और बाइकार्बोनेट लवण
- समुद्री जीवों के कैल्शियम कार्बोनेट खोल
3. स्थलीय भंडार:
- जीवित जीवों में कार्बन (जैवमात्रा)
- मृत जीवों के अवशेष
- मृदा कार्बन
- जीवाश्म ईंधन
कार्बन चक्र की प्रक्रियाएँ:
A. CO₂ का अवशोषण:
1. प्रकाश संश्लेषण:
6CO₂ + 6H₂O + सूर्य का प्रकाश → C₆H₁₂O₆ + 6O₂
- पौधे वायुमंडल से CO₂ लेते हैं
- कार्बोहाइड्रेट बनाते हैं
- कार्बन जैवमात्रा में संचित होता है
2. समुद्री अवशोषण:
- समुद्र वायुमंडलीय CO₂ को अवशोषित करते हैं
- CO₂ + H₂O ⇌ H₂CO₃ ⇌ H⁺ + HCO₃⁻ ⇌ 2H⁺ + CO₃²⁻
B. CO₂ का विमोचन:
1. श्वसन:
C₆H₁₂O₆ + 6O₂ → 6CO₂ + 6H₂O + ऊर्जा
- सभी जीव श्वसन द्वारा CO₂ छोड़ते हैं
2. विघटन:
- सूक्ष्मजीव मृत जीवों को विघटित करते हैं
- कार्बन CO₂ के रूप में मुक्त होता है
3. दहन:
- जीवाश्म ईंधनों के जलने से
- वनों की कटाई और जलने से
4. ज्वालामुखी विस्फोट:
- CO₂ और अन्य गैसें निकलती हैं
5. चूना पत्थर का विघटन:
CaCO₃ + 2HCl → CaCl₂ + H₂O + CO₂
C. दीर्घकालिक भंडारण:
1. जीवाश्म ईंधन निर्माण: लाखों वर्षों में
2. चूना पत्थर निर्माण: समुद्री जीवों के खोलों से
3. कोयला निर्माण: प्राचीन वनस्पति से
जीवाश्म ईंधनों का निर्माण:
1. कोयला का निर्माण:
चरण 1: पीट निर्माण (लगभग 10⁴ वर्ष)
- कार्बोनिफेरस युग (30-35 करोड़ वर्ष पहले)
- विशाल वन, फर्न, देवदार के जंगल
- मृत वनस्पति दलदल में जमा
- आंशिक विघटन, उच्च दाब
- पीट (Peat) बनता है (कार्बन: 60%)
चरण 2: लिग्नाइट निर्माण (लगभग 10⁶ वर्ष)
- पीट पर और अधिक दबाव
- पानी और वाष्पशील पदार्थ निकल जाते हैं
- लिग्नाइट (Lignite) बनता है (कार्बन: 70%)
- नरम, भूरा कोयला
चरण 3: बिटुमिनस कोयला (लगभग 10⁷ वर्ष)
- और अधिक दबाव और ताप
- बिटुमिनस कोयला (Bituminous coal) बनता है (कार्बन: 80-85%)
- सबसे सामान्य प्रकार का कोयला
चरण 4: एन्थ्रासाइट निर्माण (लगभग 10⁸ वर्ष)
- अत्यधिक दबाव और ताप
- एन्थ्रासाइट (Anthracite) बनता है (कार्बन: 90-95%)
- सबसे उच्च कोटि का कोयला
- कठोर, चमकदार, अधिक ऊष्मा मान
2. पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस का निर्माण:
चरण 1: जैविक पदार्थों का संचयन
- 10-20 करोड़ वर्ष पहले
- समुद्री सूक्ष्मजीव (प्लवक, शैवाल)
- मृत जीव समुद्र तल पर जमा
चरण 2: तलछटी परतों में दबाव
- रेत और मिट्टी की परतों से ढक जाना
- उच्च दाब (100-1000 atm)
- उच्च ताप (50-150°C)
चरण 3: केरोजन निर्माण
- बैक्टीरिया द्वारा आंशिक विघटन
- ऑक्सीजन की अनुपस्थिति
- केरोजन (Kerogen) बनता है - जटिल कार्बनिक पदार्थ
चरण 4: तापीय अपघटन (कैटाजेनेसिस)
- केरोजन का तापीय अपघटन
- हाइड्रोकार्बनों का निर्माण
- अपघटन के आधार पर:
• कम ताप: पेट्रोलियम (तरल)
• अधिक ताप: प्राकृतिक गैस (मीथेन)
चरण 5: प्रवास और जाल में फँसना
- हाइड्रोकार्बन चट्टानों में रिसते हैं
- अभेद्य चट्टानों द्वारा रोके जाते हैं
- जाल संरचनाओं में एकत्र होते हैं
- पेट्रोलियम जल पर तैरता है, गैस सबसे ऊपर
जीवाश्म ईंधनों की विशेषताएँ:
1. अनवीकरणीय: लाखों वर्षों में बनते हैं
2. उच्च ऊर्जा घनत्व: प्रति इकाई द्रव्यमान अधिक ऊर्जा
3. कार्बन युक्त: मुख्यतः कार्बन और हाइड्रोजन
4. सीमित भंडार: समाप्त होने वाले
महत्वपूर्ण तथ्य:
1. कोयला मुख्यतः कार्बन, पेट्रोलियम मुख्यतः हाइड्रोकार्बन
2. पेट्रोलियम में सल्फर और नाइट्रोजन भी होते हैं
3. जीवाश्म ईंधनों के दहन से ग्लोबल वार्मिंग
4. वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की आवश्यकता
प्रमुख जीवाश्म ईंधन भंडार:
1. कोयला: चीन, USA, भारत, ऑस्ट्रेलिया, रूस
2. पेट्रोलियम: सऊदी अरब, रूस, USA, ईरान, इराक
3. प्राकृतिक गैस: रूस, ईरान, कतर, USA, सऊदी अरब
भारत में जीवाश्म ईंधन:
1. कोयला: झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल
2. पेट्रोलियम: मुंबई हाई, कृष्णा-गोदावरी बेसिन, असम
3. प्राकृतिक गैस: मुंबई हाई, कृष्णा-गोदावरी बेसिन
महत्व:
1. विश्व ऊर्जा का 80% से अधिक जीवाश्म ईंधनों से
2. औद्योगिक क्रांति का आधार
3. परिवहन, बिजली उत्पादन, उद्योगों में उपयोग
4. अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण घटक
34. एल्कोहल के सेवन के दुष्प्रभावों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
एल्कोहल (एथेनॉल) के सेवन के दुष्प्रभाव:
A. तत्काल (अल्पकालिक) प्रभाव:
1. तंत्रिका तंत्र पर प्रभाव:
- केंद्रीय तंत्रिका तंत्र का अवसादन
- प्रतिक्रिया समय में कमी
- समन्वय की कमी
- भ्रम और उनींदापन
- निर्णय लेने की क्षमता में कमी
2. संज्ञानात्मक कार्यों पर प्रभाव:
- ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई
- स्मृति ह्रास
- तर्कशक्ति में कमी
- भाषण में असंगति
3. शारीरिक प्रभाव:
- मतली और उल्टी
- सिरदर्द
- धुंधली दृष्टि
- शरीर का तापमान कम होना
- निर्जलीकरण
B. दीर्घकालिक प्रभाव:
1. यकृत को हानि:
a. फैटी लिवर:
- यकृत की कोशिकाओं में वसा का जमाव
- प्रारंभिक अवस्था, प्रतिवर्ती
b. अल्कोहलिक हेपेटाइटिस:
- यकृत की सूजन
- पीलिया, बुखार, पेट दर्द
- यकृत की कोशिकाओं का नष्ट होना
c. सिरोसिस:
- यकृत की कोशिकाओं का स्थायी नुकसान
- तंतुमय ऊतक द्वारा प्रतिस्थापन
- यकृत का कार्य बंद होना
- मृत्यु का कारण
2. हृदय रोग:
- उच्च रक्तचाप
- हृदय की मांसपेशी का कमजोर होना (कार्डियोमायोपैथी)
- अनियमित हृदय गति
- हृदयाघात का खतरा
3. पाचन तंत्र को हानि:
- गैस्ट्राइटिस (आमाशय की सूजन)
- अल्सर
- अग्नाशयशोथ (पैंक्रियाटाइटिस)
- कैंसर का खतरा (आहार नली, आमाशय)
4. मस्तिष्क को हानि:
- मस्तिष्क की कोशिकाओं का नष्ट होना
- स्मृति ह्रास (Korsakoff's syndrome)
- डिमेंशिया
- मस्तिष्क का सिकुड़ना
5. प्रतिरक्षा तंत्र पर प्रभाव:
- रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होना
- संक्रमणों की संवेदनशीलता बढ़ना
- तपेदिक और निमोनिया का खतरा
6. हड्डियों को हानि:
- ऑस्टियोपोरोसिस
- हड्डियों का भंगुर होना
- फ्रैक्चर का खतरा
7. कैंसर का खतरा:
- मुंह का कैंसर
- गले का कैंसर
- आहार नली का कैंसर
- यकृत कैंसर
- स्तन कैंसर (महिलाओं में)
C. मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव:
1. अवसाद:
- उदासी और निराशा
- आत्महत्या के विचार
2. चिंता विकार:
- घबराहट के दौरे
- सामान्यीकृत चिंता विकार
3. निर्भरता और लत:
- शारीरिक निर्भरता
- मानसिक निर्भरता
- वापसी के लक्षण
4. मनोविकृति:
- मतिभ्रम (hallucinations)
- भ्रम (delusions)
एल्कोहल (एथेनॉल) के सेवन के दुष्प्रभाव:
A. तत्काल (अल्पकालिक) प्रभाव:
1. तंत्रिका तंत्र पर प्रभाव:
- केंद्रीय तंत्रिका तंत्र का अवसादन
- प्रतिक्रिया समय में कमी
- समन्वय की कमी
- भ्रम और उनींदापन
- निर्णय लेने की क्षमता में कमी
2. संज्ञानात्मक कार्यों पर प्रभाव:
- ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई
- स्मृति ह्रास
- तर्कशक्ति में कमी
- भाषण में असंगति
3. शारीरिक प्रभाव:
- मतली और उल्टी
- सिरदर्द
- धुंधली दृष्टि
- शरीर का तापमान कम होना
- निर्जलीकरण
B. दीर्घकालिक प्रभाव:
1. यकृत को हानि:
a. फैटी लिवर:
- यकृत की कोशिकाओं में वसा का जमाव
- प्रारंभिक अवस्था, प्रतिवर्ती
b. अल्कोहलिक हेपेटाइटिस:
- यकृत की सूजन
- पीलिया, बुखार, पेट दर्द
- यकृत की कोशिकाओं का नष्ट होना
c. सिरोसिस:
- यकृत की कोशिकाओं का स्थायी नुकसान
- तंतुमय ऊतक द्वारा प्रतिस्थापन
- यकृत का कार्य बंद होना
- मृत्यु का कारण
2. हृदय रोग:
- उच्च रक्तचाप
- हृदय की मांसपेशी का कमजोर होना (कार्डियोमायोपैथी)
- अनियमित हृदय गति
- हृदयाघात का खतरा
3. पाचन तंत्र को हानि:
- गैस्ट्राइटिस (आमाशय की सूजन)
- अल्सर
- अग्नाशयशोथ (पैंक्रियाटाइटिस)
- कैंसर का खतरा (आहार नली, आमाशय)
4. मस्तिष्क को हानि:
- मस्तिष्क की कोशिकाओं का नष्ट होना
- स्मृति ह्रास (Korsakoff's syndrome)
- डिमेंशिया
- मस्तिष्क का सिकुड़ना
5. प्रतिरक्षा तंत्र पर प्रभाव:
- रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होना
- संक्रमणों की संवेदनशीलता बढ़ना
- तपेदिक और निमोनिया का खतरा
6. हड्डियों को हानि:
- ऑस्टियोपोरोसिस
- हड्डियों का भंगुर होना
- फ्रैक्चर का खतरा
7. कैंसर का खतरा:
- मुंह का कैंसर
- गले का कैंसर
- आहार नली का कैंसर
- यकृत कैंसर
- स्तन कैंसर (महिलाओं में)
C. मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव:
1. अवसाद:
- उदासी और निराशा
- आत्महत्या के विचार
2. चिंता विकार:
- घबराहट के दौरे
- सामान्यीकृत चिंता विकार
3. निर्भरता और लत:
- शारीरिक निर्भरता
- मानसिक निर्भरता
- वापसी के लक्षण
4. मनोविकृति:
- मतिभ्रम (hallucinations)
- भ्रम (delusions)
36. पेन्टेन (C₅H₁₂) के सभी संभावित संरचनात्मक समावयवों की संरचनाएँ बनाइए।
उत्तर:
पेन्टेन (C₅H₁₂) के तीन संरचनात्मक समावयव हैं:
1. n-पेन्टेन (सामान्य पेन्टेन):
- IUPAC नाम: पेन्टेन
- सूत्र: CH₃-CH₂-CH₂-CH₂-CH₃
- सभी कार्बन सीधी श्रृंखला में
2. आइसोपेन्टेन (2-मेथिलब्यूटेन):
- IUPAC नाम: 2-मेथिलब्यूटेन
- सूत्र: CH₃-CH(CH₃)-CH₂-CH₃
- एक शाखा (मेथिल समूह)
3. नियोपेन्टेन (2,2-डाइमेथिलप्रोपेन):
- IUPAC नाम: 2,2-डाइमेथिलप्रोपेन
- सूत्र: CH₃-C(CH₃)₂-CH₃
- दो शाखाएँ
पेन्टेन (C₅H₁₂) के तीन संरचनात्मक समावयव हैं:
1. n-पेन्टेन (सामान्य पेन्टेन):
- IUPAC नाम: पेन्टेन
- सूत्र: CH₃-CH₂-CH₂-CH₂-CH₃
- सभी कार्बन सीधी श्रृंखला में
2. आइसोपेन्टेन (2-मेथिलब्यूटेन):
- IUPAC नाम: 2-मेथिलब्यूटेन
- सूत्र: CH₃-CH(CH₃)-CH₂-CH₃
- एक शाखा (मेथिल समूह)
3. नियोपेन्टेन (2,2-डाइमेथिलप्रोपेन):
- IUPAC नाम: 2,2-डाइमेथिलप्रोपेन
- सूत्र: CH₃-C(CH₃)₂-CH₃
- दो शाखाएँ
37. निम्नलिखित यौगिकों की इलेक्ट्रॉन बिंदु संरचना बनाइए: (i) CO₂ (ii) H₂S (iii) प्रोपेनोन (iv) F₂
उत्तर:
(i) CO₂ (कार्बन डाइऑक्साइड):
O :: C :: O
दोनों C=O द्वि-बंध
(ii) H₂S (हाइड्रोजन सल्फाइड):
H : S : H
एकल बंध
(iii) प्रोपेनोन (CH₃COCH₃):
H O H
| || |
H-C-C-C-H
| | |
H H H
कीटोन समूह (>C=O)
(iv) F₂ (फ्लोरीन अणु):
: F : F :
एकल बंध
(i) CO₂ (कार्बन डाइऑक्साइड):
O :: C :: O
दोनों C=O द्वि-बंध
(ii) H₂S (हाइड्रोजन सल्फाइड):
H : S : H
एकल बंध
(iii) प्रोपेनोन (CH₃COCH₃):
H O H
| || |
H-C-C-C-H
| | |
H H H
कीटोन समूह (>C=O)
(iv) F₂ (फ्लोरीन अणु):
: F : F :
एकल बंध
38. साबुन के जल में घोलने पर मिसेल का निर्माण क्यों होता है? क्या एथेनॉल जैसे विलायक में भी मिसेल बनेंगे?
उत्तर:
मिसेल निर्माण का कारण:
1. साबुन अणु द्विध्रुवीय होते हैं
2. जलरागी सिरा जल के प्रति आकर्षित
3. जलविरागी पूँछ जल से विरोध करती है
4. अणु स्वयं को इस प्रकार व्यवस्थित करते हैं कि जलविरागी पूँछें अंदर और जलरागी सिरे बाहर हों
एथेनॉल में मिसेल:
नहीं, एथेनॉल में मिसेल नहीं बनेंगे क्योंकि:
1. एथेनॉल अध्रुवीय विलायक है
2. साबुन का जलविरागी भाग भी एथेनॉल में घुल जाएगा
3. मिसेल बनने के लिए विलायक और अणु के बीच विरोध आवश्यक है
मिसेल निर्माण का कारण:
1. साबुन अणु द्विध्रुवीय होते हैं
2. जलरागी सिरा जल के प्रति आकर्षित
3. जलविरागी पूँछ जल से विरोध करती है
4. अणु स्वयं को इस प्रकार व्यवस्थित करते हैं कि जलविरागी पूँछें अंदर और जलरागी सिरे बाहर हों
एथेनॉल में मिसेल:
नहीं, एथेनॉल में मिसेल नहीं बनेंगे क्योंकि:
1. एथेनॉल अध्रुवीय विलायक है
2. साबुन का जलविरागी भाग भी एथेनॉल में घुल जाएगा
3. मिसेल बनने के लिए विलायक और अणु के बीच विरोध आवश्यक है
39. कार्बन यौगिकों का उपयोग ईंधन के रूप में अधिकांश अनुप्रयोगों में क्यों किया जाता है?
उत्तर:
1. उच्च कैलोरी मान: अधिक ऊर्जा उत्पादन
2. ज्वलनशीलता: आसानी से जलते हैं
3. आसान भंडारण: गैस, तरल, ठोस रूप में
4. व्यापक उपलब्धता: कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस
5. विविध उपयोग: वाहन, उद्योग, घरेलू
6. नियंत्रित दहन: दर नियंत्रित की जा सकती है
7. स्वच्छ दहन: पूर्ण दहन पर CO₂ और H₂O
8. आसान परिवहन: पाइपलाइन, टैंकरों द्वारा
1. उच्च कैलोरी मान: अधिक ऊर्जा उत्पादन
2. ज्वलनशीलता: आसानी से जलते हैं
3. आसान भंडारण: गैस, तरल, ठोस रूप में
4. व्यापक उपलब्धता: कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस
5. विविध उपयोग: वाहन, उद्योग, घरेलू
6. नियंत्रित दहन: दर नियंत्रित की जा सकती है
7. स्वच्छ दहन: पूर्ण दहन पर CO₂ और H₂O
8. आसान परिवहन: पाइपलाइन, टैंकरों द्वारा
40. हाइड्रोजनीकरण क्या है? इसके औद्योगिक अनुप्रयोग लिखिए।
उत्तर:
हाइड्रोजनीकरण: असंतृप्त हाइड्रोकार्बन में उत्प्रेरक (Ni, Pd) की उपस्थिति में हाइड्रोजन जोड़कर संतृप्त हाइड्रोकार्बन बनाने की अभिक्रिया
उदाहरण: CH₂=CH₂ + H₂ →[Ni]→ CH₃-CH₃
औद्योगिक अनुप्रयोग:
1. वनस्पति घी बनाना: वनस्पति तेलों का हाइड्रोजनीकरण
2. मार्जरीन उत्पादन: मक्खन का विकल्प
3. पेट्रोरसायन उद्योग: विभिन्न रसायनों का उत्पादन
4. वसा उद्योग: खाद्य तेलों के गुण सुधारना
5. अमोनिया संश्लेषण: N₂ + 3H₂ → 2NH₃
6. फार्मास्यूटिकल: दवाओं का संश्लेषण
7. प्लास्टिक उद्योग: पॉलीमर निर्माण
हाइड्रोजनीकरण: असंतृप्त हाइड्रोकार्बन में उत्प्रेरक (Ni, Pd) की उपस्थिति में हाइड्रोजन जोड़कर संतृप्त हाइड्रोकार्बन बनाने की अभिक्रिया
उदाहरण: CH₂=CH₂ + H₂ →[Ni]→ CH₃-CH₃
औद्योगिक अनुप्रयोग:
1. वनस्पति घी बनाना: वनस्पति तेलों का हाइड्रोजनीकरण
2. मार्जरीन उत्पादन: मक्खन का विकल्प
3. पेट्रोरसायन उद्योग: विभिन्न रसायनों का उत्पादन
4. वसा उद्योग: खाद्य तेलों के गुण सुधारना
5. अमोनिया संश्लेषण: N₂ + 3H₂ → 2NH₃
6. फार्मास्यूटिकल: दवाओं का संश्लेषण
7. प्लास्टिक उद्योग: पॉलीमर निर्माण
41. एथेन का आणविक सूत्र C₂H₆ है। इसमें कितने सहसंयोजक आबंध हैं?
उत्तर: 7 सहसंयोजक आबंध
व्याख्या:
एथेन (C₂H₆) की संरचना: CH₃-CH₃
1. C-C बंध: 1
2. C-H बंध: 6 (प्रत्येक कार्बन से 3 H)
कुल: 1 + 6 = 7 सहसंयोजक आबंध
व्याख्या:
एथेन (C₂H₆) की संरचना: CH₃-CH₃
1. C-C बंध: 1
2. C-H बंध: 6 (प्रत्येक कार्बन से 3 H)
कुल: 1 + 6 = 7 सहसंयोजक आबंध
42. ब्यूटेनॉन चर्तु-कार्बन यौगिक है, जिसका प्रकार्यात्मक समूह क्या है?
उत्तर: कीटोन (>C=O)
व्याख्या:
ब्यूटेनॉन: CH₃-CH₂-CO-CH₃
4 कार्बन, कीटोन समूह दूसरे कार्बन पर
संरचना: CH₃-CH₂-C(=O)-CH₃
व्याख्या:
ब्यूटेनॉन: CH₃-CH₂-CO-CH₃
4 कार्बन, कीटोन समूह दूसरे कार्बन पर
संरचना: CH₃-CH₂-C(=O)-CH₃
43. खाना बनाते समय यदि बर्तन की तली बाहर से काली हो रही है तो इसका मतलब है कि—
उत्तर: ईंधन पूरी तरह से नहीं जल रहा है
व्याख्या:
1. अपूर्ण दहन के कारण कार्बन कण (कज्जल) बनते हैं
2. ये कण बर्तन की तली पर जमा हो जाते हैं
3. कारण: ऑक्सीजन की कमी, वायु छिद्र बंद होना
4. उपाय: वायु छिद्र साफ करें, पर्याप्त वायु आपूर्ति सुनिश्चित करें
व्याख्या:
1. अपूर्ण दहन के कारण कार्बन कण (कज्जल) बनते हैं
2. ये कण बर्तन की तली पर जमा हो जाते हैं
3. कारण: ऑक्सीजन की कमी, वायु छिद्र बंद होना
4. उपाय: वायु छिद्र साफ करें, पर्याप्त वायु आपूर्ति सुनिश्चित करें
44. CH₃Cl में आबंध निर्माण का उपयोग कर सहसंयोजक आबंध की प्रकृति समझाइए।
उत्तर:
CH₃Cl (क्लोरोमेथेन) में:
1. कार्बन: 4 संयोजकता इलेक्ट्रॉन
2. हाइड्रोजन: 1 संयोजकता इलेक्ट्रॉन (3 H)
3. क्लोरीन: 7 संयोजकता इलेक्ट्रॉन
बंध निर्माण:
1. कार्बन 3 हाइड्रोजन के साथ 3 इलेक्ट्रॉन युग्म साझा करता है
2. कार्बन 1 क्लोरीन के साथ 1 इलेक्ट्रॉन युग्म साझा करता है
3. कुल: 4 सहसंयोजक बंध (3 C-H, 1 C-Cl)
4. कार्बन का अष्टक पूरा होता है
5. हाइड्रोजन का द्विक पूरा होता है
6. क्लोरीन का अष्टक पूरा होता है
CH₃Cl (क्लोरोमेथेन) में:
1. कार्बन: 4 संयोजकता इलेक्ट्रॉन
2. हाइड्रोजन: 1 संयोजकता इलेक्ट्रॉन (3 H)
3. क्लोरीन: 7 संयोजकता इलेक्ट्रॉन
बंध निर्माण:
1. कार्बन 3 हाइड्रोजन के साथ 3 इलेक्ट्रॉन युग्म साझा करता है
2. कार्बन 1 क्लोरीन के साथ 1 इलेक्ट्रॉन युग्म साझा करता है
3. कुल: 4 सहसंयोजक बंध (3 C-H, 1 C-Cl)
4. कार्बन का अष्टक पूरा होता है
5. हाइड्रोजन का द्विक पूरा होता है
6. क्लोरीन का अष्टक पूरा होता है
45. इलेक्ट्रॉन बिंदु संरचना बनाइए— (a) एथेनॉइक अम्ल (b) H₂S (c) प्रोपेनोन (d) F₂
उत्तर:
(a) एथेनॉइक अम्ल (CH₃COOH):
H O
| ||
H-C-C-O-H
| |
H H
कार्बोक्सिल समूह (-COOH)
(b) H₂S (हाइड्रोजन सल्फाइड):
H : S : H
एकल बंध
(c) प्रोपेनोन (CH₃COCH₃):
H O H
| || |
H-C-C-C-H
| | |
H H H
कीटोन समूह
(d) F₂ (फ्लोरीन अणु):
: F : F :
एकल बंध
(a) एथेनॉइक अम्ल (CH₃COOH):
H O
| ||
H-C-C-O-H
| |
H H
कार्बोक्सिल समूह (-COOH)
(b) H₂S (हाइड्रोजन सल्फाइड):
H : S : H
एकल बंध
(c) प्रोपेनोन (CH₃COCH₃):
H O H
| || |
H-C-C-C-H
| | |
H H H
कीटोन समूह
(d) F₂ (फ्लोरीन अणु):
: F : F :
एकल बंध
46. समजातीय श्रेणी क्या है? उदाहरण के साथ समझाइए।
उत्तर:
समजातीय श्रेणी: कार्बनिक यौगिकों की श्रृंखला जिसमें:
1. सभी सदस्यों में एक ही प्रकार्यात्मक समूह
2. क्रमागत सदस्यों में -CH₂- का अंतर
3. रासायनिक गुण समान
4. भौतिक गुण क्रमबद्ध रूप से बदलते हैं
उदाहरण: एल्केन श्रेणी
सामान्य सूत्र: CₙH₂ₙ₊₂
1. मेथेन: CH₄
2. एथेन: C₂H₆ (CH₄ + CH₂)
3. प्रोपेन: C₃H₈ (C₂H₆ + CH₂)
4. ब्यूटेन: C₄H₁₀ (C₃H₈ + CH₂)
5. पेन्टेन: C₅H₁₂ (C₄H₁₀ + CH₂)
समजातीय श्रेणी: कार्बनिक यौगिकों की श्रृंखला जिसमें:
1. सभी सदस्यों में एक ही प्रकार्यात्मक समूह
2. क्रमागत सदस्यों में -CH₂- का अंतर
3. रासायनिक गुण समान
4. भौतिक गुण क्रमबद्ध रूप से बदलते हैं
उदाहरण: एल्केन श्रेणी
सामान्य सूत्र: CₙH₂ₙ₊₂
1. मेथेन: CH₄
2. एथेन: C₂H₆ (CH₄ + CH₂)
3. प्रोपेन: C₃H₈ (C₂H₆ + CH₂)
4. ब्यूटेन: C₄H₁₀ (C₃H₈ + CH₂)
5. पेन्टेन: C₅H₁₂ (C₄H₁₀ + CH₂)
47. भौतिक एवं रासायनिक गुणधर्मों के आधार पर एथनॉल एवं एथेनॉइक अम्ल में आप कैसे अंतर करेंगे?
उत्तर:
| गुण | एथेनॉल | एथेनॉइक अम्ल |
|---|---|---|
| प्रकृति | उदासीन | अम्लीय |
| लिटमस परीक्षण | कोई प्रभाव नहीं | नीला लिटमस लाल |
| NaHCO₃ के साथ | कोई अभिक्रिया | CO₂ गैस देता है |
| गंध | मादक | सिरके जैसी |
| क्वथनांक | 78°C | 118°C |
| एस्टरीकरण | अम्ल के साथ एस्टर बनाता है | एल्कोहल के साथ एस्टर बनाता है |
48. जब साबुन को जल में डाला जाता है तो मिसेल का निर्माण क्यों होता है? क्या एथनॉल जैसे दूसरे विलायकों में भी मिसेल का निर्माण होगा?
उत्तर:
मिसेल निर्माण का कारण:
1. साबुन अणु द्विध्रुवीय: जलरागी सिरा + जलविरागी पूँछ
2. जल में जलविरागी पूँछें एकत्र होकर अंदर की ओर व्यवस्थित होती हैं
3. जलरागी सिरे बाहर की ओर जल के साथ अन्योन्यक्रिया करते हैं
4. यह ऊर्जा की दृष्टि से अनुकूल व्यवस्था है
एथेनॉल में मिसेल:
नहीं, क्योंकि एथेनॉल अध्रुवीय विलायक है और साबुन के दोनों भाग इसमें घुल जाएँगे।
मिसेल निर्माण का कारण:
1. साबुन अणु द्विध्रुवीय: जलरागी सिरा + जलविरागी पूँछ
2. जल में जलविरागी पूँछें एकत्र होकर अंदर की ओर व्यवस्थित होती हैं
3. जलरागी सिरे बाहर की ओर जल के साथ अन्योन्यक्रिया करते हैं
4. यह ऊर्जा की दृष्टि से अनुकूल व्यवस्था है
एथेनॉल में मिसेल:
नहीं, क्योंकि एथेनॉल अध्रुवीय विलायक है और साबुन के दोनों भाग इसमें घुल जाएँगे।
49. कार्बन एवं उसके यौगिकों का उपयोग अधिकतर अनुप्रयोगों में ईंधन के रूप में क्यों किया जाता है?
उत्तर:
1. उच्च ऊर्जा घनत्व: अधिक ऊष्मा मुक्त करते हैं
2. ज्वलनशील: आसानी से जलते हैं
3. भंडारण योग्य: गैस, तरल, ठोस रूप में
4. सुलभ: कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस प्रचुर मात्रा में
5. विविध उपयोग: वाहन, उद्योग, बिजली उत्पादन
6. नियंत्रण योग्य: दहन दर नियंत्रित की जा सकती है
7. पोर्टेबल: आसानी से ले जाया जा सकता है
8. सस्ता: अन्य ऊर्जा स्रोतों की तुलना में
1. उच्च ऊर्जा घनत्व: अधिक ऊष्मा मुक्त करते हैं
2. ज्वलनशील: आसानी से जलते हैं
3. भंडारण योग्य: गैस, तरल, ठोस रूप में
4. सुलभ: कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस प्रचुर मात्रा में
5. विविध उपयोग: वाहन, उद्योग, बिजली उत्पादन
6. नियंत्रण योग्य: दहन दर नियंत्रित की जा सकती है
7. पोर्टेबल: आसानी से ले जाया जा सकता है
8. सस्ता: अन्य ऊर्जा स्रोतों की तुलना में
50. कठोर जल को साबुन से उपचारित करने पर झाग के निर्माण को समझाइए।
उत्तर:
1. कठोर जल: Ca²⁺ और Mg²⁺ आयन युक्त जल
2. साबुन: वसा अम्लों के सोडियम लवण
3. अभिक्रिया: साबुन + कठोर जल → अघुलनशील कैल्सियम/मैग्नीशियम लवण (स्कम)
4. समीकरण:
2C₁₇H₃₅COONa + Ca²⁺ → (C₁₇H₃₅COO)₂Ca↓ + 2Na⁺
5. परिणाम:
- स्कम बनता है
- साबुन की खपत बढ़ती है
- झाग कम बनता है
- सफाई प्रभावी नहीं होती
6. उपाय: जल को मृदु करना या डिटर्जेंट का उपयोग
1. कठोर जल: Ca²⁺ और Mg²⁺ आयन युक्त जल
2. साबुन: वसा अम्लों के सोडियम लवण
3. अभिक्रिया: साबुन + कठोर जल → अघुलनशील कैल्सियम/मैग्नीशियम लवण (स्कम)
4. समीकरण:
2C₁₇H₃₅COONa + Ca²⁺ → (C₁₇H₃₅COO)₂Ca↓ + 2Na⁺
5. परिणाम:
- स्कम बनता है
- साबुन की खपत बढ़ती है
- झाग कम बनता है
- सफाई प्रभावी नहीं होती
6. उपाय: जल को मृदु करना या डिटर्जेंट का उपयोग
51. यदि आप लिटमस पत्र (लाल एवं नीला) से साबुन की जाँच करें तो आपका प्रेक्षण क्या होगा?
उत्तर:
प्रेक्षण:
1. नीला लिटमस: नीला रहता है (कोई परिवर्तन नहीं)
2. लाल लिटमस: नीला हो जाता है
कारण:
साबुन क्षारीय प्रकृति का होता है क्योंकि यह दुर्बल अम्ल (वसा अम्ल) और प्रबल क्षार (NaOH) का लवण है।
साबुन जल में हाइड्रोलिसिस होकर क्षारीय विलयन देता है।
प्रेक्षण:
1. नीला लिटमस: नीला रहता है (कोई परिवर्तन नहीं)
2. लाल लिटमस: नीला हो जाता है
कारण:
साबुन क्षारीय प्रकृति का होता है क्योंकि यह दुर्बल अम्ल (वसा अम्ल) और प्रबल क्षार (NaOH) का लवण है।
साबुन जल में हाइड्रोलिसिस होकर क्षारीय विलयन देता है।
52. हाइड्रोजनीकरण क्या है? इसका औद्योगिक अनुप्रयोग क्या है?
उत्तर:
हाइड्रोजनीकरण: असंतृप्त यौगिकों में उत्प्रेरक की उपस्थिति में हाइड्रोजन जोड़ने की अभिक्रिया
उदाहरण: CH₂=CH₂ + H₂ →[Ni]→ CH₃-CH₃
औद्योगिक अनुप्रयोग:
1. वनस्पति घी निर्माण: तेलों को घी में बदलना
2. मार्जरीन बनाना: मक्खन का विकल्प
3. पेट्रोल उद्योग: ऑक्टेन मान बढ़ाना
4. वसा उद्योग: खाद्य तेलों के गुण सुधारना
5. फार्मास्यूटिकल: दवाओं का संश्लेषण
6. प्लास्टिक उद्योग: पॉलीमर निर्माण
7. अमोनिया उत्पादन: N₂ + 3H₂ → 2NH₃
हाइड्रोजनीकरण: असंतृप्त यौगिकों में उत्प्रेरक की उपस्थिति में हाइड्रोजन जोड़ने की अभिक्रिया
उदाहरण: CH₂=CH₂ + H₂ →[Ni]→ CH₃-CH₃
औद्योगिक अनुप्रयोग:
1. वनस्पति घी निर्माण: तेलों को घी में बदलना
2. मार्जरीन बनाना: मक्खन का विकल्प
3. पेट्रोल उद्योग: ऑक्टेन मान बढ़ाना
4. वसा उद्योग: खाद्य तेलों के गुण सुधारना
5. फार्मास्यूटिकल: दवाओं का संश्लेषण
6. प्लास्टिक उद्योग: पॉलीमर निर्माण
7. अमोनिया उत्पादन: N₂ + 3H₂ → 2NH₃
53. दिए गए हाइड्रोकार्बन— C₂H₆, C₃H₈, C₃H₆, C₂H₂ एवं CH₄ में किसमें संकलन अभिक्रिया होती है?
उत्तर: C₃H₆ (प्रोपीन) और C₂H₂ (एथाइन) में
कारण:
संकलन अभिक्रिया (हाइड्रोजनीकरण) केवल असंतृप्त हाइड्रोकार्बन में होती है:
1. C₃H₆ (प्रोपीन): CH₃-CH=CH₂ (द्वि-बंध, असंतृप्त)
2. C₂H₂ (एथाइन): HC≡CH (त्रि-बंध, असंतृप्त)
अन्य संतृप्त हैं:
CH₄, C₂H₆, C₃H₈ - इनमें केवल एकल बंध हैं
कारण:
संकलन अभिक्रिया (हाइड्रोजनीकरण) केवल असंतृप्त हाइड्रोकार्बन में होती है:
1. C₃H₆ (प्रोपीन): CH₃-CH=CH₂ (द्वि-बंध, असंतृप्त)
2. C₂H₂ (एथाइन): HC≡CH (त्रि-बंध, असंतृप्त)
अन्य संतृप्त हैं:
CH₄, C₂H₆, C₃H₈ - इनमें केवल एकल बंध हैं
54. संतृप्त एवं असंतृप्त कार्बन के बीच रासायनिक अंतर समझने के लिए एक परीक्षण बताइए।
उत्तर: ब्रोमीन जल परीक्षण
सिद्धांत: असंतृप्त हाइड्रोकार्बन ब्रोमीन जल का रंग हरा-पीला से रंगहीन कर देते हैं, संतृप्त नहीं करते।
विधि:
1. दो परखनलियों में ब्रोमीन जल लें (हरा-पीला रंग)
2. एक में संतृप्त हाइड्रोकार्बन (जैसे हेक्सेन) मिलाएँ
3. दूसरे में असंतृप्त हाइड्रोकार्बन (जैसे हेक्सीन) मिलाएँ
4. हिलाएँ और प्रेक्षण करें
प्रेक्षण:
- संतृप्त: रंग नहीं बदलता
- असंतृप्त: रंगहीन हो जाता है
कारण: असंतृप्त यौगिक ब्रोमीन से अभिक्रिया कर रंगहीन यौगिक बनाते हैं।
सिद्धांत: असंतृप्त हाइड्रोकार्बन ब्रोमीन जल का रंग हरा-पीला से रंगहीन कर देते हैं, संतृप्त नहीं करते।
विधि:
1. दो परखनलियों में ब्रोमीन जल लें (हरा-पीला रंग)
2. एक में संतृप्त हाइड्रोकार्बन (जैसे हेक्सेन) मिलाएँ
3. दूसरे में असंतृप्त हाइड्रोकार्बन (जैसे हेक्सीन) मिलाएँ
4. हिलाएँ और प्रेक्षण करें
प्रेक्षण:
- संतृप्त: रंग नहीं बदलता
- असंतृप्त: रंगहीन हो जाता है
कारण: असंतृप्त यौगिक ब्रोमीन से अभिक्रिया कर रंगहीन यौगिक बनाते हैं।
55. साबुन की सफ़ाई प्रक्रिया की क्रियाविधि समझाइए।
उत्तर:
साबुन की सफाई क्रियाविधि:
1. साबुन अणु की संरचना:
- जलरागी सिरा (-COO⁻Na⁺): जल के प्रति आकर्षित
- जलविरागी पूँछ (हाइड्रोकार्बन): जल से विरोध
2. मिसेल निर्माण:
- जल में साबुन अणु जलविरागी पूँछें अंदर और जलरागी सिरे बाहर रखकर गोलाकार संरचनाएँ (मिसेल) बनाते हैं
3. मैल का समावेशन:
- साबुन का जलविरागी भाग तैलीय मैल से चिपकता है
- मैल के कण मिसेल के केंद्र में फँस जाते हैं
4. पायस निर्माण:
- मिसेल जल में कोलॉइडल विलयन बनाते हैं
- तैलीय मैल पायस (इमल्शन) बनाता है
5. धुलाई:
- पानी के साथ मिसेल बह जाते हैं
- मैल भी बह जाता है
- सतह साफ हो जाती है
साबुन की सफाई क्रियाविधि:
1. साबुन अणु की संरचना:
- जलरागी सिरा (-COO⁻Na⁺): जल के प्रति आकर्षित
- जलविरागी पूँछ (हाइड्रोकार्बन): जल से विरोध
2. मिसेल निर्माण:
- जल में साबुन अणु जलविरागी पूँछें अंदर और जलरागी सिरे बाहर रखकर गोलाकार संरचनाएँ (मिसेल) बनाते हैं
3. मैल का समावेशन:
- साबुन का जलविरागी भाग तैलीय मैल से चिपकता है
- मैल के कण मिसेल के केंद्र में फँस जाते हैं
4. पायस निर्माण:
- मिसेल जल में कोलॉइडल विलयन बनाते हैं
- तैलीय मैल पायस (इमल्शन) बनाता है
5. धुलाई:
- पानी के साथ मिसेल बह जाते हैं
- मैल भी बह जाता है
- सतह साफ हो जाती है
56. मिसेल क्या है? यह कैसे बनता है?
उत्तर:
मिसेल: साबुन अणुओं की गोलाकार संरचना जिसमें जलविरागी पूँछें अंदर और जलरागी सिरे बाहर की ओर होते हैं।
मिसेल निर्माण:
1. साबुन को जल में मिलाने पर
2. जलरागी सिरा जल के साथ अन्योन्यक्रिया करता है
3. जलविरागी पूँछ जल से दूर भागती है
4. अणु स्वयं को इस प्रकार व्यवस्थित करते हैं कि जलविरागी पूँछें अंदर की ओर हों
5. जलरागी सिरे बाहर की ओर जल के साथ संपर्क में रहते हैं
6. यह व्यवस्था ऊर्जा की दृष्टि से अनुकूल है
मिसेल: साबुन अणुओं की गोलाकार संरचना जिसमें जलविरागी पूँछें अंदर और जलरागी सिरे बाहर की ओर होते हैं।
मिसेल निर्माण:
1. साबुन को जल में मिलाने पर
2. जलरागी सिरा जल के साथ अन्योन्यक्रिया करता है
3. जलविरागी पूँछ जल से दूर भागती है
4. अणु स्वयं को इस प्रकार व्यवस्थित करते हैं कि जलविरागी पूँछें अंदर की ओर हों
5. जलरागी सिरे बाहर की ओर जल के साथ संपर्क में रहते हैं
6. यह व्यवस्था ऊर्जा की दृष्टि से अनुकूल है
57. कार्बन के कौन-से गुण इसे विशेष बनाते हैं?
उत्तर:
1. चतुःसंयोजकता: 4 बंध बना सकता है
2. श्रृंखलन: लंबी श्रृंखलाएँ बना सकता है
3. कार्बन-कार्बन बंध की प्रबलता: स्थायी बंध
4. विभिन्न तत्वों के साथ बंधन: H, O, N, S, Cl आदि
5. समजातीय श्रेणी बनाना: -CH₂- का अंतर
6. अपररूपता: हीरा, ग्रेफाइट, फुलेरीन
7. द्वि और त्रि-बंध बनाना: असंतृप्त यौगिक
8. वलय बनाना: चक्रीय यौगिक
9. प्रकार्यात्मक समूह: विभिन्न समूह जोड़ सकता है
1. चतुःसंयोजकता: 4 बंध बना सकता है
2. श्रृंखलन: लंबी श्रृंखलाएँ बना सकता है
3. कार्बन-कार्बन बंध की प्रबलता: स्थायी बंध
4. विभिन्न तत्वों के साथ बंधन: H, O, N, S, Cl आदि
5. समजातीय श्रेणी बनाना: -CH₂- का अंतर
6. अपररूपता: हीरा, ग्रेफाइट, फुलेरीन
7. द्वि और त्रि-बंध बनाना: असंतृप्त यौगिक
8. वलय बनाना: चक्रीय यौगिक
9. प्रकार्यात्मक समूह: विभिन्न समूह जोड़ सकता है
58. साबुन के जल में घोलने पर मिसेल का निर्माण क्यों होता है? क्या एथेनॉल जैसे विलायक में भी मिसेल बनेंगे?
उत्तर: जल में साबुन के अणु जलरागी और जलविरागी भाग के कारण मिसेल बनाते हैं। एथेनॉल में मिसेल नहीं बनेंगे क्योंकि एथेनॉल अध्रुवीय विलायक है।
59. कार्बन यौगिकों का उपयोग ईंधन के रूप में अधिकांश अनुप्रयोगों में क्यों किया जाता है?
उत्तर: कार्बन यौगिक उच्च कैलोरी मान, ज्वलनशीलता, आसान भंडारण और व्यापक उपलब्धता के कारण ईंधन के रूप में प्रयोग किए जाते हैं।
60. हाइड्रोजनीकरण क्या है? इसके औद्योगिक अनुप्रयोग लिखिए।
उत्तर: हाइड्रोजनीकरण असंतृप्त यौगिकों में हाइड्रोजन जोड़ने की अभिक्रिया है।
औद्योगिक अनुप्रयोग:
1. वनस्पति घी उत्पादन
2. वसा उद्योग
3. पेट्रोरसायन उद्योग
औद्योगिक अनुप्रयोग:
1. वनस्पति घी उत्पादन
2. वसा उद्योग
3. पेट्रोरसायन उद्योग
निष्कर्ष
यदि आपने ये सभी 60 प्रश्न हल कर लिए हैं, तो इस अध्याय की परीक्षा तैयारी लगभग 100% पूरी हो जाएगी।
सभी प्रश्नों को समझें और रोजाना अभ्यास करें। शुभकामनाएँ!

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