Chapter 2: भारत में राष्ट्रवाद
VVI Question Bank & Test (Part 2)
स्वागत है पार्ट 2 में! पार्ट 1 में हमने नोट्स के जरिए कॉन्सेप्ट्स क्लियर किए थे। अब बारी है 'आंसर राइटिंग' की। याद रखिए, बोर्ड एग्जाम में सिर्फ सही उत्तर लिखना काफी नहीं है, बल्कि शब्द सीमा (Word Limit) और प्रस्तुति (Presentation) सबसे ज्यादा मायने रखती है। नीचे दिए गए प्रश्न (Short Answer Type) बिहार बोर्ड और CBSE के लिए 'Most Wanted' हैं। इन्हें रटें नहीं, समझकर लिखें!
⚠️ रुकिए! (Wait)
क्या आपको इस चैप्टर की पूरी कहानी (Story) याद है? अगर नहीं, तो टेस्ट देने से पहले नोट्स जरूर पढ़ें।
Section A: लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Questions)
निर्देश: प्रत्येक प्रश्न का उत्तर 100 से 150 शब्दों में दें।
मुख्य घटना: इस कानून को भारतीयों ने "काला कानून" कहा क्योंकि यह सरकार को असीमित शक्ति देता था। इसके तहत पुलिस किसी भी व्यक्ति को बिना किसी वारंट के गिरफ्तार कर सकती थी और बिना मुकदमा चलाए उसे दो साल तक जेल में बंद रख सकती थी। भारतीय सदस्यों के भारी विरोध के बावजूद इसे लागू किया गया। महात्मा गांधी ने इसके खिलाफ 'रॉलेट सत्याग्रह' शुरू किया, जिसमें 6 अप्रैल को देशव्यापी हड़ताल का आह्वान किया गया।
परिणाम: इसके विरोध में देशभर में रैलियाँ निकाली गईं और दुकानें बंद कर दी गईं। इसी दमनकारी कानून का विरोध अंततः जलियाँवाला बाग हत्याकांड जैसी दुखद घटना का कारण बना और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक नया मोड़ आया।
मुख्य घटना: जलियाँवाला बाग में हजारों लोग शांतिपूर्ण तरीके से सभा कर रहे थे और बैसाखी मना रहे थे। तभी जनरल डायर अपने सैनिकों के साथ वहाँ पहुँचा और उसने बाग से बाहर निकलने के एकमात्र रास्ते को बंद कर दिया। बिना किसी चेतावनी के, उसने निहत्थी भीड़ पर अंधाधुंध गोलियां चलवा दीं। यह गोलीबारी लगभग 10 मिनट तक चली, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए और हजारों घायल हो गए।
परिणाम: इस नरसंहार की खबर फैलते ही पूरे उत्तर भारत में आक्रोश फैल गया। लोग सड़कों पर उतर आए और सरकारी इमारतों पर हमले किए। रवींद्रनाथ टैगोर ने अपनी 'नाइटहुड' की उपाधि लौटा दी और महात्मा गांधी ने हिंसा होते देख सत्याग्रह आंदोलन को वापस ले लिया।
मुख्य घटना: खलीफा की शक्तियों की रक्षा के लिए बंबई में मार्च 1919 में एक 'खिलाफत समिति' का गठन किया गया। इसके प्रमुख नेता मुहम्मद अली और शौकत अली (अली बंधु) थे। उन्होंने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ एक जन आंदोलन शुरू करने की चर्चा की। महात्मा गांधी ने इसे एक सुनहरे अवसर के रूप में देखा।
परिणाम: गांधीजी को लगा कि खिलाफत का समर्थन करके वे हिंदुओं और मुसलमानों को एक मंच पर ला सकते हैं और एक बड़ा राष्ट्रीय आंदोलन खड़ा कर सकते हैं। इसी उद्देश्य से, सितंबर 1920 में कलकत्ता अधिवेशन में उन्होंने कांग्रेस के नेताओं को असहयोग आंदोलन शुरू करने के लिए राजी कर लिया।
मुख्य घटना: इस आंदोलन के तीन प्रमुख कारण थे। पहला, **रॉलेट एक्ट** और उसके बाद हुआ **जलियाँवाला बाग हत्याकांड**, जिसने अंग्रेजों के न्याय से भारतीयों का भरोसा तोड़ दिया। दूसरा, **खिलाफत का मुद्दा**, जिससे मुस्लिम समाज अंग्रेजों से नाराज था। तीसरा, **स्वराज की मांग**; गांधीजी ने अपनी पुस्तक 'हिंद स्वराज' में कहा था कि भारत में ब्रिटिश शासन भारतीयों के सहयोग से ही टिका है। यदि भारतीय सहयोग करना बंद कर दें, तो ब्रिटिश राज साल भर में ढह जाएगा।
परिणाम: इन कारणों से प्रेरित होकर, नागपुर अधिवेशन (दिसंबर 1920) में असहयोग कार्यक्रम को स्वीकृति मिली। हजारों छात्रों ने स्कूल-कॉलेज छोड़े, वकीलों ने अदालतें छोड़ीं और विदेशी कपड़ों की होली जलाई गई।
मुख्य घटना: 4 फरवरी 1922 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के चौरी-चौरा नामक स्थान पर एक शांतिपूर्ण जुलूस पुलिस के साथ टकराव में बदल गया। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज किया और गोलियां चलाईं। जवाब में, क्रोधित भीड़ ने पुलिस थाने को घेर लिया और उसमें आग लगा दी। इस घटना में 22 पुलिसकर्मी जिंदा जलकर मर गए। यह गांधीजी के सत्य और अहिंसा के सिद्धांतों के पूरी तरह खिलाफ था।
परिणाम: इस हिंसा से दुखी होकर महात्मा गांधी ने महसूस किया कि लोग अभी व्यापक सविनय अवज्ञा के लिए तैयार नहीं हैं। उन्होंने तुरंत असहयोग आंदोलन को वापस लेने की घोषणा कर दी, जिससे कई कांग्रेसी नेता हैरान रह गए थे।
मुख्य घटना: इस कमीशन का मुख्य कार्य भारत के संविधान में सुधार के सुझाव देना था। लेकिन समस्या यह थी कि इस सात सदस्यीय आयोग में **एक भी भारतीय सदस्य नहीं था**; सभी अंग्रेज थे। भारतीयों को लगा कि यह उनका अपमान है और अंग्रेज उनके भाग्य का फैसला करने के लिए उन्हें योग्य नहीं समझते।
परिणाम: जब 1928 में साइमन कमीशन भारत पहुँचा, तो उसका स्वागत "साइमन वापस जाओ" (Simon Go Back) के नारों और काले झंडों से किया गया। कांग्रेस और मुस्लिम लीग सहित सभी पार्टियों ने इसका विरोध किया। इसी विरोध प्रदर्शन के दौरान लाला लाजपत राय पर लाठीचार्ज हुआ, जिसके बाद उनकी मृत्यु हो गई।
मुख्य घटना: दिसंबर 1929 में, जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में लाहौर में कांग्रेस का ऐतिहासिक अधिवेशन हुआ। इस अधिवेशन में कांग्रेस ने 'पूर्ण स्वराज' (Full Independence) की मांग को औपचारिक रूप से स्वीकार किया। यह तय किया गया कि 26 जनवरी 1930 को 'स्वतंत्रता दिवस' के रूप में मनाया जाएगा और लोग पूर्ण स्वाधीनता के लिए संघर्ष की शपथ लेंगे।
परिणाम: यद्यपि 26 जनवरी 1930 का उत्सव बहुत कम लोगों का ध्यान खींच पाया, लेकिन इस घटना ने भविष्य के भारतीय संविधान की नींव रखी (यही कारण है कि 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस चुना गया)। इसके बाद ही गांधीजी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू करने का निर्णय लिया।
मुख्य घटना: 12 मार्च 1930 को गांधीजी ने अपने 78 विश्वसनीय स्वयंसेवकों के साथ साबरमती आश्रम से दांडी (गुजरात के तटीय शहर) तक 240 मील की पैदल यात्रा शुरू की। 6 अप्रैल को वे दांडी पहुँचे और समुद्र का पानी उबालकर नमक बनाया। यह ब्रिटिश कानून का खुला उल्लंघन था।
परिणाम: दांडी मार्च ने सविनय अवज्ञा आंदोलन (Civil Disobedience Movement) की शुरुआत की। इसके बाद देश भर में हजारों लोगों ने नमक कानून तोड़ा, सरकारी कारखानों के सामने प्रदर्शन किए, और शराब की दुकानों की पिकेटिंग की। यह आंदोलन असहयोग आंदोलन से एक कदम आगे था क्योंकि इसमें न केवल सहयोग बंद करना था, बल्कि औपनिवेशिक कानूनों को तोड़ना भी था।
मुख्य घटना: असहयोग आंदोलन (1920-22) का मुख्य उद्देश्य सरकार के साथ 'सहयोग न करना' था, जैसे स्कूल, कॉलेज और अदालतों का बहिष्कार। इसका लक्ष्य औपनिवेशिक शासन को पंगु बनाना था। दूसरी ओर, सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930-34) का उद्देश्य केवल असहयोग करना नहीं था, बल्कि जानबूझकर 'औपनिवेशिक कानूनों का उल्लंघन' करना था, जैसे नमक कानून या वन कानून तोड़ना।
परिणाम: सविनय अवज्ञा आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी असहयोग आंदोलन की तुलना में बहुत अधिक थी। हालाँकि, असहयोग आंदोलन के समय हिंदू-मुस्लिम एकता (खिलाफत के कारण) ज्यादा मजबूत थी, जबकि सविनय अवज्ञा के समय मुस्लिम लीग और कांग्रेस के बीच दूरियाँ बढ़ गई थीं।
मुख्य घटना: इस समझौते के तहत, गांधीजी ने लंदन में होने वाले दूसरे गोलमेज सम्मेलन (Round Table Conference) में हिस्सा लेने की सहमति दी (कांग्रेस ने पहले सम्मेलन का बहिष्कार किया था)। बदले में, सरकार ने उन सभी राजनीतिक कैदियों को रिहा करने पर सहमति जताई जिन पर हिंसा के आरोप नहीं थे। सरकार ने तटीय इलाकों में लोगों को अपने इस्तेमाल के लिए नमक बनाने की भी छूट दी।
परिणाम: इस समझौते के बाद गांधीजी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन को स्थगित कर दिया और लंदन गए। हालांकि, सम्मेलन में वार्ता विफल रही और गांधीजी को निराश होकर लौटना पड़ा, जिसके बाद उन्होंने आंदोलन दोबारा शुरू किया।
मुख्य घटना: इसके विरोध में गांधीजी यरवदा जेल में आमरण अनशन पर बैठ गए। अंततः, अंबेडकर और गांधीजी के बीच एक समझौता हुआ, जिसे सितंबर 1932 में 'पूना पैक्ट' के नाम से जाना गया। इसमें दलित वर्गों (जिन्हें बाद में अनुसूचित जाति कहा गया) को प्रांतीय और केंद्रीय विधायी परिषदों में आरक्षित सीटें दी गईं, लेकिन उनका चुनाव सामान्य निर्वाचन क्षेत्रों से ही होना था।
परिणाम: पूना पैक्ट ने दलितों को राजनीतिक अधिकार दिलाए और साथ ही हिंदू समाज के विभाजन को रोका। इसने स्वतंत्रता आंदोलन में दलितों के मुद्दों को मुख्यधारा में ला दिया।
मुख्य घटना: गांधीजी के 'नमक सत्याग्रह' के आह्वान पर हजारों औरतें अपने घरों से बाहर निकलीं। उन्होंने जुलूसों में हिस्सा लिया, नमक बनाया, और विदेशी कपड़ों व शराब की दुकानों की पिकेटिंग (धरना) की। शहर में ऊँची जाति की महिलाएं और गाँवों में संपन्न किसान परिवारों की महिलाएं इस आंदोलन में आगे थीं। वे जेल भी गईं। उनके लिए राष्ट्र की सेवा करना अब एक पवित्र कर्तव्य बन गया था।
परिणाम: हालांकि महिलाओं की इस सार्वजनिक भूमिका से उनकी सामाजिक स्थिति में तुरंत कोई बड़ा बदलाव नहीं आया और कांग्रेस में भी लंबे समय तक उन्हें कोई बड़ा पद नहीं मिला, लेकिन इससे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को एक नई नैतिक ताकत और व्यापकता मिली।
मुख्य घटना: सी.आर. दास और मोतीलाल नेहरू ने कांग्रेस के भीतर ही 'स्वराज पार्टी' का गठन किया। वे 'परिवर्तनवादी' कहलाए। उनका तर्क था कि हमें व्यवस्था के भीतर घुसकर उसे तोड़ना चाहिए और यह दिखाना चाहिए कि ये परिषदें वास्तव में लोकतांत्रिक नहीं हैं। दूसरी ओर, जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस जैसे युवा नेता पूर्ण स्वतंत्रता के लिए जन-आंदोलन के पक्ष में थे।
परिणाम: स्वराज पार्टी ने चुनावों में भाग लिया और कुछ हद तक सफलता भी पाई, लेकिन 1920 के दशक के अंत तक राजनीतिक अस्थिरता और साइमन कमीशन के आने से जन-आंदोलन की मांग फिर से प्रबल हो गई।
मुख्य घटना: इतिहास, साहित्य, लोककथाएं और गीतों ने इसमें अहम भूमिका निभाई। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 'वंदे मातरम्' लिखा और 'भारत माता' की छवि बनाई, जिसे बाद में अबनीन्द्रनाथ टैगोर ने चित्रित किया। गांधीजी ने 'स्वराज ध्वज' (तिरंगा) तैयार किया, जिसके बीच में चरखा था जो स्वावलंबन का प्रतीक था। राष्ट्रवादियों ने लोककथाओं को पुनर्जीवित किया ताकि भारतीयों में अपनी प्राचीन संस्कृति के प्रति गर्व का भाव पैदा हो सके।
परिणाम: इन सांस्कृतिक प्रतीकों ने विविधताओं से भरे भारत को एक सूत्र में पिरोने का काम किया। लोगों ने औपनिवेशिक शासन के खिलाफ अपनी साझा पहचान को पहचाना, जिसने आजादी की लड़ाई को मजबूत किया।
मुख्य घटना: 'इनलैंड इमिग्रेशन एक्ट' (1859) के तहत बागानी मजदूरों को बिना इजाजत चाय के बागान छोड़ने की मनाही थी। जब उन्होंने असहयोग आंदोलन के बारे में सुना, तो उन्हें लगा कि अब 'गांधी राज' आ रहा है और सबको अपने गाँव में जमीन मिलेगी। हजारों मजदूरों ने अधिकारियों की बात मानने से इनकार कर दिया, बागान छोड़ दिए और अपने घर की ओर चल पड़े।
परिणाम: हालांकि, वे अपनी मंजिल तक नहीं पहुँच पाए। रेलवे और स्टीमर की हड़ताल के कारण वे रास्ते में ही फंस गए और पुलिस द्वारा बेरहमी से पीटे गए। फिर भी, उनका यह विद्रोह दिखाता है कि आम लोग गांधीजी के नाम और स्वराज को अपनी मुसीबतों के हल के रूप में देखते थे।
🎉 End of Section A. Next: Long Answer Questions!
Section B: दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Questions)
निर्देश: प्रत्येक प्रश्न का उत्तर 300 से 350 शब्दों में दें। (अंक: 5)
परिचय:
प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) केवल यूरोपीय शक्तियों के बीच की लड़ाई नहीं थी, बल्कि इसका गहरा प्रभाव भारत की राजनीति और अर्थव्यवस्था पर भी पड़ा। युद्ध ने एक नई आर्थिक और राजनीतिक स्थिति पैदा कर दी, जिसने भारतीय राष्ट्रवाद को एक नई दिशा और ऊर्जा प्रदान की। इसने भारतीयों को यह महसूस कराया कि औपनिवेशिक शासन उनके हितों के खिलाफ है।
मुख्य बिंदु:
- रक्षा व्यय में भारी वृद्धि:
युद्ध के कारण ब्रिटिश सरकार का रक्षा खर्चा बहुत बढ़ गया था। इस खर्चे की भरपाई के लिए सरकार ने भारतीयों पर करों का बोझ डाल दिया। सीमा शुल्क (Custom Duties) बढ़ा दिए गए और पहली बार भारत में 'आयकर' (Income Tax) शुरू किया गया। इससे आम जनता पर आर्थिक दबाव बहुत बढ़ गया। - कीमतों में बेतहाशा बढ़ोतरी:
युद्ध के वर्षों (1913 से 1918) के बीच चीजों की कीमतें दोगुनी हो गईं। भोजन, कपड़े और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतें आसमान छूने लगीं। इससे आम आदमी का जीवन अत्यंत कष्टदायी हो गया और उनमें ब्रिटिश सरकार के प्रति गहरा आक्रोश पैदा हुआ। - जबरन भर्ती:
गांवों में सिपाहियों की कमी को पूरा करने के लिए सरकार ने 'जबरन भर्ती' (Forced Recruitment) शुरू की। ग्रामीण युवकों को सेना में भर्ती होने के लिए मजबूर किया गया। इससे ग्रामीण इलाकों में व्यापक गुस्सा फैल गया, क्योंकि लोग किसी और के युद्ध में अपनी जान नहीं देना चाहते थे। - महामारी और अकाल:
युद्ध के बाद के समय में (1918-19 और 1920-21) भारत के कई हिस्सों में फसलें खराब हो गईं, जिससे भोजन की भारी कमी हो गई। उसी समय 'इन्फ्लूएंजा' महामारी भी फैल गई। 1921 की जनगणना के अनुसार, अकाल और महामारी के कारण 120 से 130 लाख लोग मारे गए।
निष्कर्ष:
लोगों को उम्मीद थी कि युद्ध खत्म होने के बाद उनकी मुसीबतें कम होंगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इस घोर निराशा और गुस्से ने महात्मा गांधी के नेतृत्व में एक बड़े जन-आंदोलन के लिए उपजाऊ जमीन तैयार की। इस प्रकार, प्रथम विश्व युद्ध भारतीय राष्ट्रवाद के लिए एक उत्प्रेरक (Catalyst) साबित हुआ।
परिचय:
1920 में महात्मा गांधी द्वारा शुरू किया गया असहयोग आंदोलन भारत का पहला व्यापक जन-आंदोलन था। गांधीजी ने अपनी पुस्तक 'हिंद स्वराज' में तर्क दिया था कि यदि भारतीय अंग्रेजों का सहयोग करना बंद कर दें, तो ब्रिटिश शासन ढह जाएगा। यह आंदोलन अन्याय के खिलाफ अहिंसक प्रतिरोध का एक प्रयोग था।
आंदोलन के चरण और कार्यक्रम:
- उपाधियों का त्याग:
आंदोलन की शुरुआत पदवियों और उपाधियों को लौटाने से हुई। गांधीजी ने अपनी 'कैसर-ए-हिंद' की उपाधि लौटा दी। रवींद्रनाथ टैगोर ने भी अपना विरोध दर्ज कराया। - बहिष्कार (Boycott):
इस आंदोलन का मुख्य हथियार बहिष्कार था। हजारों छात्रों ने सरकारी स्कूल-कॉलेज छोड़ दिए। शिक्षकों ने इस्तीफा दे दिया और वकीलों (जैसे मोतीलाल नेहरू, सी.आर. दास) ने वकालत छोड़ दी। विदेशी कपड़ों की होली जलाई गई, जिससे विदेशी कपड़ों का आयात 1921-22 के बीच आधा रह गया। - स्वदेशी का प्रचार:
विदेशी सामानों के बहिष्कार के साथ-साथ 'खादी' और चरखे को बढ़ावा दिया गया। यह आर्थिक स्वतंत्रता का प्रतीक बन गया।
आंदोलन के धीमे पड़ने के कारण:
- महंगी खादी:
खादी का कपड़ा मिलों में बने कपड़ों की तुलना में बहुत महंगा था। गरीब जनता इसे लंबे समय तक वहन नहीं कर सकती थी, इसलिए वे दोबारा मिल के कपड़ों की ओर मुड़ने लगे। - वैकल्पिक संस्थानों की कमी:
ब्रिटिश संस्थानों (स्कूल, कॉलेज, अदालत) का बहिष्कार तो किया गया, लेकिन उनके स्थान पर भारतीय संस्थानों की स्थापना बहुत धीमी गति से हुई। छात्रों और शिक्षकों के पास वापस ब्रिटिश स्कूलों में जाने के अलावा कोई चारा नहीं बचा।
निष्कर्ष:
यद्यपि यह आंदोलन पूरी तरह से अपने लक्ष्यों को प्राप्त नहीं कर सका और चौरी-चौरा की हिंसक घटना (1922) के कारण इसे वापस ले लिया गया, लेकिन इसने भारतीय जनता के मन से अंग्रेजों का डर निकाल दिया और आजादी की लड़ाई को जन-जन तक पहुँचा दिया।
परिचय:
असहयोग आंदोलन में भारत के विभिन्न सामाजिक वर्गों ने हिस्सा लिया, लेकिन हर समूह की अपनी आकांक्षाएं और 'स्वराज' का अपना अर्थ था। गांधीजी का आह्वान सबके लिए था, लेकिन लोगों ने इसे अपनी स्थानीय समस्याओं के चश्मे से देखा।
विभिन्न समूहों की भागीदारी:
- शहरी मध्य वर्ग:
शहरों में आंदोलन की शुरुआत मध्यम वर्ग ने की। छात्रों, शिक्षकों और वकीलों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। उनके लिए स्वराज का मतलब राजनीतिक आजादी और सरकारी नौकरियों में भेदभाव का अंत था। हालांकि, आर्थिक कारणों से उनका उत्साह जल्दी ही ठंडा पड़ गया। - अवध के किसान:
बाबा रामचंद्र के नेतृत्व में अवध के किसानों ने तालुकदारों और जमींदारों के खिलाफ आंदोलन किया। वे बहुत अधिक लगान और 'बेगार' (बिना वेतन के काम) से परेशान थे। उनके लिए स्वराज का मतलब था- "लगान में कमी, बेगार का खात्मा और दमनकारी जमींदारों का सामाजिक बहिष्कार।" उन्होंने 'नाई-धोबी बंद' जैसे फैसले भी लिए। - आदिवासी किसान (गुडेम हिल्स):
आंध्र प्रदेश की गुडेम पहाड़ियों में अल्लूरी सीताराम राजू के नेतृत्व में आदिवासियों ने गुरिल्ला युद्ध छेड़ा। वे वन कानूनों से नाराज थे जो उन्हें जंगल में मवेशी चराने या लकड़ी बीनने से रोकते थे। उनके लिए स्वराज का अर्थ अपने पारंपरिक वन अधिकारों को वापस पाना था। राजू गांधीजी की प्रशंसा करते थे लेकिन उनका मानना था कि आजादी अहिंसा से नहीं, बल्कि बल प्रयोग से मिलेगी। - बागानी मजदूर:
असम के चाय बागानों में काम करने वाले मजदूरों के लिए स्वतंत्रता का मतलब उस चारदीवारी से बाहर निकलने का अधिकार था जिसमें वे कैद थे। उन्होंने सोचा कि गांधी राज में उन्हें अपने गांवों में जमीन मिलेगी।
निष्कर्ष:
इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि 'स्वराज' एक अमूर्त शब्द नहीं था। हर वर्ग ने इसका अर्थ अपने दुखों और कष्टों से मुक्ति के रूप में लगाया। फिर भी, गांधीजी के नाम ने इन सभी अलग-अलग आंदोलनों को एक अखिल भारतीय संघर्ष के सूत्र में पिरो दिया।
परिचय:
1930 में दांडी मार्च के साथ शुरू हुआ सविनय अवज्ञा आंदोलन, 1920 के असहयोग आंदोलन से एक कदम आगे था। जहाँ असहयोग आंदोलन का लक्ष्य केवल ब्रिटिश सरकार का सहयोग न करना था, वहीं सविनय अवज्ञा का लक्ष्य जानबूझकर औपनिवेशिक कानूनों को तोड़ना था। यह आंदोलन अधिक आक्रामक और व्यापक था।
सविनय अवज्ञा आंदोलन की मुख्य विशेषताएं:
- कानूनों का उल्लंघन:
इस आंदोलन की शुरुआत ही नमक कानून तोड़ने से हुई। इसके बाद देश भर में लोगों ने आरक्षित वनों में घुसकर वन कानूनों का उल्लंघन किया, और चौकीदारी कर चुकाने से मना कर दिया। यह पहली बार था जब भारतीयों ने सीधे तौर पर कानूनों को चुनौती दी। - महिलाओं की व्यापक भागीदारी:
इस आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता महिलाओं की सक्रिय भूमिका थी। हजारों महिलाएं अपने घरों से बाहर निकलीं, जुलूसों में हिस्सा लिया, नमक बनाया और जेल गईं। यह भारतीय समाज में एक बड़े बदलाव का संकेत था। - व्यापारिक वर्ग का समर्थन:
इस आंदोलन को भारतीय व्यापारियों और उद्योगपतियों का खुला समर्थन मिला। उन्होंने आंदोलन को आर्थिक सहायता दी और आयातित वस्तुओं का व्यापार करने से मना कर दिया। वे औपनिवेशिक पाबंदियों के खिलाफ थे जो उनके व्यापार को रोकती थीं।
असहयोग आंदोलन से अंतर:
- लक्ष्य: असहयोग का लक्ष्य 'स्वराज' था (जो अस्पष्ट था), जबकि सविनय अवज्ञा का लक्ष्य 'पूर्ण स्वराज' (Complete Independence) था।
- विधि: असहयोग में कानून तोड़ना शामिल नहीं था, जबकि सविनय अवज्ञा का आधार ही कानून तोड़ना था।
- मुस्लिम भागीदारी: असहयोग आंदोलन (खिलाफत के कारण) में हिंदू-मुस्लिम एकता चरम पर थी, लेकिन सविनय अवज्ञा के समय मुस्लिम संगठनों की भागीदारी काफी कम थी।
निष्कर्ष:
सविनय अवज्ञा आंदोलन ने ब्रिटिश साम्राज्य की जड़ों को हिला दिया। इसने दुनिया को दिखाया कि भारतीय अब ब्रिटिश कानूनों को मानने के लिए बाध्य नहीं हैं। यह आजादी की दिशा में एक निर्णायक कदम था।
परिचय:
राष्ट्रवाद केवल राजनीतिक संघर्ष नहीं है; यह लोगों की कल्पना और भावनाओं में भी आकार लेता है। भारत में राष्ट्रवाद का विकास तब हुआ जब लोगों ने महसूस किया कि वे एक ही राष्ट्र का हिस्सा हैं। इस 'सामूहिक अपनेपन' की भावना को जगाने में सांस्कृतिक प्रक्रियाओं, इतिहास और प्रतीकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
मुख्य कारक:
- भारत माता की छवि:
राष्ट्र की पहचान को अक्सर एक छवि के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने सबसे पहले 'भारत माता' की परिकल्पना की और 'वंदे मातरम्' गीत लिखा। बाद में अबनीन्द्रनाथ टैगोर ने भारत माता को एक संन्यासिनी के रूप में चित्रित किया—शांत, गंभीर और आध्यात्मिक। इस छवि के प्रति श्रद्धा राष्ट्रवाद का प्रमाण बन गई। - लोककथाओं का पुनर्जीवन:
राष्ट्रवादियों ने लोकगीतों और जनश्रुतियों को इकट्ठा करना शुरू किया। रवींद्रनाथ टैगोर (बंगाल) और नटेसा शास्त्री (मद्रास - 'द फोकलोर्स ऑफ सदर्न इंडिया') जैसे नेताओं का मानना था कि लोककथाएं ही हमारी असली संस्कृति हैं, जो विदेशी प्रभाव से भ्रष्ट नहीं हुई हैं। इससे लोगों में अपनी जड़ों के प्रति गर्व पैदा हुआ। - झंडा (ध्वज) का महत्व:
प्रतीकों ने लोगों को एकजुट किया। बंगाल में स्वदेशी आंदोलन के दौरान एक तिरंगा (लाल, हरा, पीला) तैयार किया गया। 1921 तक गांधीजी ने भी 'स्वराज का झंडा' तैयार कर लिया था। यह भी तिरंगा (सफेद, हरा, लाल) था, जिसके बीच में चरखा था। जुलूसों में इस झंडे को थामना शासन के प्रति अवज्ञा का संकेत था। - इतिहास की पुनर्व्याख्या:
अंग्रेजों ने भारतीयों को पिछड़ा और आदिम बताया था। इसके जवाब में, भारतीय इतिहासकारों ने भारत के गौरवशाली अतीत (प्राचीन काल की गणित, विज्ञान, और वास्तुकला की उपलब्धियां) के बारे में लिखना शुरू किया। इसका उद्देश्य लोगों में आत्मसम्मान (Self-esteem) जगाना था।
निष्कर्ष:
इन सांस्कृतिक प्रयासों ने भाषा और जाति की बाधाओं को तोड़कर भारतीयों को एक भावनात्मक धागे में बांध दिया। इसने राजनीतिक आंदोलन को एक सांस्कृतिक आधार दिया, जिससे राष्ट्रवाद अधिक गहरा और स्थायी हो गया।
(Questions 6 to 10 Continue below...)
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परिचय:
सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930-1934) ब्रिटिश शासन के खिलाफ एक शक्तिशाली संघर्ष था, जिसने औपनिवेशिक सरकार की नींव हिला दी थी। फिर भी, यह आंदोलन एक अखंड भारतीय मोर्चा बनाने में पूरी तरह सफल नहीं हो सका। समाज के कुछ विशिष्ट वर्गों, विशेषकर दलितों और मुसलमानों के एक बड़े हिस्से ने इसमें सक्रिय रूप से भाग नहीं लिया। यह अलगाव इस आंदोलन की एक प्रमुख 'सीमा' (Limitation) बन गया।
मुख्य सीमाएं और कारण:
- दलितों (अछूतों) की उपेक्षा:
लंबे समय तक कांग्रेस ने दलितों की समस्याओं पर ध्यान नहीं दिया क्योंकि उसे डर था कि इससे रूढ़िवादी सवर्ण हिंदू (सनातनी) नाराज हो जाएंगे। दलित नेता अपने समुदाय के लिए केवल राजनीतिक हल चाहते थे। वे शिक्षण संस्थानों में आरक्षण और विधायी परिषदों के लिए 'पृथक निर्वाचन क्षेत्रों' (Separate Electorates) की मांग कर रहे थे। डॉ. बी.आर. अंबेडकर का मानना था कि केवल राजनीतिक सशक्तिकरण ही उनकी सामाजिक अपंगता को दूर कर सकता है। इसलिए, नागपुर जैसे कुछ क्षेत्रों को छोड़कर, दलितों की भागीदारी इस आंदोलन में सीमित रही। - मुस्लिम संगठनों का अविश्वास:
असहयोग-खिलाफत आंदोलन (1920-22) के बाद, मुसलमानों का एक बड़ा वर्ग कांग्रेस से दूर हो गया था। 1920 के दशक के मध्य से कांग्रेस 'हिंदू महासभा' जैसे हिंदू राष्ट्रवादी संगठनों के करीब दिखाई देने लगी थी। जैसे-जैसे हिंदुओं और मुसलमानों के बीच संबंध खराब हुए, दोनों समुदायों के बीच सांप्रदायिक टकराव और दंगे बढ़ गए। इससे आपसी विश्वास की कमी हो गई। - अल्पसंख्यक होने का डर:
मुस्लिम लीग के नेता, जैसे मुहम्मद अली जिन्ना, मुसलमानों के लिए केंद्रीय सभा में आरक्षित सीटों की मांग कर रहे थे। मुस्लिम नेताओं को इस बात की गहरी चिंता थी कि हिंदू बहुसंख्या वाले भारत में मुसलमानों की संस्कृति और पहचान सुरक्षित नहीं रहेगी। सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान, कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच तालमेल बैठाने के प्रयास विफल रहे, जिसके कारण मुस्लिम जनता ने उस उत्साह के साथ आंदोलन में हिस्सा नहीं लिया जैसा उन्होंने असहयोग आंदोलन में लिया था।
निष्कर्ष:
इस प्रकार, आंतरिक सामाजिक विभाजन सविनय अवज्ञा आंदोलन की सबसे बड़ी कमजोरी साबित हुआ। अंग्रेजों ने इस फूट का फायदा उठाया। यह स्पष्ट हो गया कि 'स्वराज' की लड़ाई केवल अंग्रेजों से नहीं थी, बल्कि भारतीय समाज को भीतर से एकजुट करने की भी थी।
परिचय:
भारतीय व्यापारी और उद्योगपति सविनय अवज्ञा आंदोलन के सबसे मुखर समर्थकों में से थे। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने भारी मुनाफा कमाया था और वे एक ताकतवर सामाजिक वर्ग बन चुके थे। वे अपने व्यापार को बढ़ाने के लिए औपनिवेशिक नीतियों का विरोध कर रहे थे जो उनकी प्रगति में बाधा बन रही थीं।
समर्थन के कारण और भूमिका:
- आयात से सुरक्षा की मांग:
भारतीय व्यवसायी चाहते थे कि विदेशी वस्तुओं के आयात पर रोक लगाई जाए ताकि भारतीय उद्योगों को पनपने का मौका मिले। वे 'रुपया-स्टर्लिंग' विदेशी विनिमय अनुपात में ऐसा बदलाव चाहते थे जिससे आयात हतोत्साहित हो। - संगठित विरोध (FICCI):
अपने हितों को संगठित तरीके से रखने के लिए उन्होंने 1920 में 'भारतीय औद्योगिक एवं व्यावसायिक कांग्रेस' और 1927 में 'फिक्की' (FICCI) का गठन किया। पुरुषोत्तमदास ठाकुरदास और जी.डी. बिड़ला जैसे उद्योगपतियों ने औपनिवेशिक नियंत्रण का कड़ा विरोध किया। - आर्थिक सहायता:
व्यवसायी वर्ग ने सविनय अवज्ञा आंदोलन को भारी वित्तीय सहायता (Funding) दी। उन्होंने आयातित कपड़ों को खरीदने या बेचने से इनकार कर दिया। उनके लिए 'स्वराज' का मतलब एक ऐसा भारत था जहाँ व्यापार पर औपनिवेशिक पाबंदियां नहीं होंगी।
उत्साह कम होने के कारण:
- गोलमेज सम्मेलन की विफलता:
दूसरे गोलमेज सम्मेलन की विफलता के बाद, व्यापारिक वर्ग का उत्साह ठंडा पड़ गया। वे लंबी अशांति और हड़तालों से डरते थे, क्योंकि इससे व्यापार ठप हो जाता था। - समाजवाद का डर:
कांग्रेस के युवा नेताओं (जैसे जवाहरलाल नेहरू) के बीच समाजवाद (Socialism) का प्रभाव बढ़ रहा था। उद्योगपतियों को डर था कि समाजवादी विचारधारा निजी संपत्ति और बड़े उद्योगों के खिलाफ हो सकती है।
निष्कर्ष:
शुरुआत में व्यवसायी वर्ग ने आंदोलन को "ईंधन" दिया, लेकिन अंततः अपने वर्गीय हितों और समाजवाद के बढ़ते प्रभाव के कारण वे आंदोलन से थोड़ा पीछे हट गए। फिर भी, राष्ट्रीय आंदोलन को आर्थिक आधार प्रदान करने में उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण थी।
परिचय:
भारत के ग्रामीण इलाकों में सविनय अवज्ञा आंदोलन ने व्यापक रूप लिया, लेकिन सभी किसानों के मुद्दे एक जैसे नहीं थे। अमीर किसान और गरीब किसान, दोनों ने आंदोलन में हिस्सा लिया, लेकिन उनकी मांगें अलग-अलग थीं और कई बार एक-दूसरे के विपरीत (Conflicting) भी थीं। कांग्रेस के लिए इन दोनों वर्गों को एक साथ साधे रखना एक बड़ी चुनौती थी।
अमीर किसानों का दृष्टिकोण (पाटीदार और जाट):
- गुजरात के पाटीदार और उत्तर प्रदेश के जाट जैसे अमीर किसान व्यावसायिक फसलों (Commercial Crops) की खेती करते थे।
- समस्या: 1929 की आर्थिक मंदी के कारण कृषि उत्पादों की कीमतें बुरी तरह गिर गईं। उनकी नकद आय खत्म हो गई, लेकिन सरकार ने लगान (Revenue) कम करने से साफ इनकार कर दिया।
- संघर्ष: उनके लिए स्वराज का मतलब "भारी लगान के खिलाफ लड़ाई" था। उन्होंने बढ़-चढ़कर आंदोलन में हिस्सा लिया और अपने समुदायों को एकजुट किया। लेकिन जब 1931 में बिना लगान घटे आंदोलन वापस ले लिया गया, तो उन्हें बहुत निराशा हुई। इसी कारण 1932 में जब आंदोलन दोबारा शुरू हुआ, तो उन्होंने इसमें रुचि नहीं ली।
गरीब किसानों का दृष्टिकोण:
- गरीब किसान केवल लगान कम करने में रुचि नहीं रखते थे। उनमें से कई छोटे पट्टेदार (Tenants) थे जो जमींदारों की जमीन पर खेती करते थे।
- समस्या: मंदी के कारण उनकी आमदनी भी गिर गई थी और वे जमींदारों को जमीन का भाड़ा (Rent) चुकाने में असमर्थ थे।
- मांग: वे चाहते थे कि जमींदारों का बकाया भाड़ा माफ कर दिया जाए। इसके लिए उन्होंने कई जगह समाजवादी और कम्युनिस्टों के नेतृत्व में उग्र प्रदर्शन किए।
कांग्रेस की दुविधा:
कांग्रेस अमीर किसानों और जमींदारों का समर्थन खोना नहीं चाहती थी, क्योंकि वे पार्टी को चंदा देते थे और ग्रामीण प्रभाव रखते थे। इसलिए, कांग्रेस गरीब किसानों की 'भाड़ा विरोधी' (No Rent) मांग का खुलकर समर्थन करने में हिचकिचाती रही।
निष्कर्ष:
इस विरोधाभास के कारण, गरीब किसानों और कांग्रेस के बीच संबंध अनिश्चित बने रहे। यह दर्शाता है कि राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान भी आंतरिक वर्गीय संघर्ष मौजूद थे, जिसे पूरी तरह सुलझाया नहीं जा सका।
परिचय:
महात्मा गांधी ने दुनिया को अन्याय के खिलाफ लड़ने का एक बिल्कुल नया हथियार दिया—'सत्याग्रह'। इसका शाब्दिक अर्थ है "सत्य के लिए आग्रह"। यह केवल एक राजनीतिक रणनीति नहीं थी, बल्कि एक गहरा जीवन दर्शन था। गांधीजी ने दक्षिण अफ्रीका के नस्लभेदी शासन के खिलाफ सबसे पहले इसका सफल प्रयोग किया था।
सत्याग्रह के मुख्य तत्व:
- सत्य की शक्ति:
सत्याग्रह का मूल मंत्र यह था कि अगर आपका उद्देश्य सच्चा है और आपकी लड़ाई अन्याय के खिलाफ है, तो आपको अपने उत्पीड़क (Oppressor) से लड़ने के लिए शारीरिक बल की आवश्यकता नहीं है। सत्य अपने आप में सबसे बड़ी ताकत है। - अहिंसा (Non-violence):
सत्याग्रही प्रतिशोध की भावना या आक्रामकता का सहारा नहीं लेता। वह कष्ट सहकर भी अहिंसक बना रहता है। गांधीजी का मानना था कि "अहिंसा का धर्म" सभी भारतीयों को एक सूत्र में पिरो सकता है। - शत्रु की चेतना को झकझोरना:
सत्याग्रह में दुश्मन को हराया नहीं जाता, बल्कि उसे जीता जाता है। उद्देश्य शत्रु को यह अहसास दिलाना है कि वह गलत कर रहा है। सत्य को हिंसा के द्वारा थोपने के बजाय, उसे शत्रु के हृदय परिवर्तन द्वारा स्वीकार कराया जाना चाहिए।
निष्क्रिय प्रतिरोध से अंतर:
- यूरोप में 'निष्क्रिय प्रतिरोध' को कमजोरों का हथियार माना जाता था, जिसमें लोग हथियार इसलिए नहीं उठाते क्योंकि वे कमजोर हैं।
- इसके विपरीत, गांधीजी ने कहा कि सत्याग्रह दुर्बलों का नहीं, बल्कि सबलों का हथियार है। इसमें हिंसा का प्रयोग न करना कायरता नहीं, बल्कि अत्यधिक आत्मबल और साहस का प्रतीक है। यह 'सक्रिय प्रतिरोध' है जो शारीरिक चोट पहुँचाने के बजाय नैतिक दबाव डालता है।
निष्कर्ष:
सत्याग्रह ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को एक नैतिक धरातल प्रदान किया। इसने आम निहत्थे भारतीयों को दुनिया के सबसे शक्तिशाली ब्रिटिश साम्राज्य के सामने निडर होकर खड़ा होने की शक्ति दी।
परिचय:
आधुनिक विश्व में राष्ट्रवाद का उदय अक्सर राष्ट्र-राज्यों (Nation-states) के निर्माण के साथ हुआ। लेकिन भारत और वियतनाम जैसे उपनिवेशों में राष्ट्रवाद की कहानी थोड़ी अलग थी। यहाँ राष्ट्रवाद का जन्म और विकास मुख्य रूप से औपनिवेशिक (ब्रिटिश) शासन के खिलाफ संघर्ष की प्रक्रिया में हुआ।
व्याख्या के मुख्य बिंदु:
- साझा शत्रु और साझा उत्पीड़न:
ब्रिटिश शासन ने भारत के हर वर्ग को किसी न किसी रूप में प्रताड़ित किया। किसानों पर भारी कर, आदिवासियों के वन अधिकारों का हनन, व्यापारियों पर पाबंदियां, और शिक्षित वर्ग की उपेक्षा—इन सबने अलग-अलग समूहों को एक 'साझा शत्रु' (Common Enemy) के खिलाफ खड़ा कर दिया। इस साझा उत्पीड़न के भाव ने विविध भारतीयों को एक-दूसरे से जोड़ दिया। - एकता की खोज:
अंग्रेजों के आने से पहले भारत विभिन्न रियासतों, भाषाओं और जातियों में बंटा था। औपनिवेशिक शासन के खिलाफ संघर्ष ने लोगों को यह एहसास दिलाया कि उनकी समस्याएं भले ही अलग हों, लेकिन उन समस्याओं की जड़ एक ही है—विदेशी शासन। कांग्रेस और गांधीजी ने इन अलग-अलग असंतोषों को एक राष्ट्रीय मंच पर इकट्ठा किया। - राजनीतिक और प्रशासनिक एकीकरण:
अंग्रेजों ने अपने फायदे के लिए भारत में रेलवे, डाक और संचार सेवाएं शुरू कीं और पूरे देश में एक समान कानून व्यवस्था लागू की। इसने अनजाने में भारत के अलग-अलग हिस्सों के लोगों को आपस में जुड़ने, यात्रा करने और विचार साझा करने का अवसर दिया, जिससे 'राष्ट्रीय चेतना' (National Consciousness) का विकास हुआ। - प्रतिक्रिया स्वरूप सांस्कृतिक जागरण:
जब औपनिवेशिक शासकों ने भारतीय संस्कृति को पिछड़ा बताया, तो इसके जवाब में भारतीयों ने अपने इतिहास और संस्कृति को पुनर्जीवित किया। यह आत्मसम्मान की लड़ाई राष्ट्रवाद का एक प्रमुख हिस्सा बन गई।
निष्कर्ष:
अतः, हम कह सकते हैं कि औपनिवेशिक शासन वह भट्ठी थी जिसमें तपकर भारतीय राष्ट्रवाद कुंदन बनकर निकला। उत्पीड़न की प्रक्रिया में ही भारतीयों ने अपनी एकता को पहचाना और एक राष्ट्र के रूप में उभर कर सामने आए।
Top 100 VVI Objective Questions
(Live Test Series - Chapter 2)
Topper's Challenge: नीचे दिए गए प्रश्नों को हल करें और 'उत्तर देखें' पर क्लिक करें।
Q1. गांधीजी दक्षिण अफ्रीका से भारत कब लौटे?
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Q2. 'रॉलेट एक्ट' (Rowlatt Act) किस वर्ष पारित हुआ था?
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Q3. जलियाँवाला बाग हत्याकांड किस तिथि को हुआ था?
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Q4. 'हिंद स्वराज' (Hind Swaraj) नामक पुस्तक की रचना किसने की थी?
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Q5. चौरी-चौरा की हिंसक घटना के बाद गांधीजी ने किस आंदोलन को वापस ले लिया?
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Q6. साइमन कमीशन (Simon Commission) भारत कब पहुँचा?
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Q7. पूर्ण स्वराज (Complete Independence) की मांग कांग्रेस के किस अधिवेशन में की गई?
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Q8. सविनय अवज्ञा आंदोलन (Civil Disobedience Movement) की शुरुआत किस यात्रा से हुई?
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Q9. 'सीमांत गांधी' (Frontier Gandhi) के नाम से किसे जाना जाता है?
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Q10. पूना पैक्ट (Poona Pact) किनके बीच हुआ था?
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Q11. 'वंदे मातरम्' गीत किसने लिखा था?
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Q12. गांधीजी ने भारत में अपना पहला सत्याग्रह कहाँ किया था?
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Q13. 'दमित वर्ग एसोसिएशन' (Depressed Classes Association) की स्थापना किसने की?
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Q14. 'भारत माता' की पहली तस्वीर किसने बनाई थी?
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Q15. 1929 में भारत के लिए 'डोमिनियन स्टेटस' का गोलमोल ऐलान किसने किया था?
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Q16. फिक्की (FICCI) का गठन कब हुआ?
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Q17. बाबा रामचंद्र ने किसानों का नेतृत्व कहाँ किया था?
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Q18. आंध्र प्रदेश की गुडेम पहाड़ियों में आदिवासी किसानों के विद्रोह का नेता कौन था?
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Q19. गांधी-इरविन समझौता (Gandhi-Irwin Pact) कब हुआ था?
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Q20. 'स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा' - यह नारा किसने दिया?
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Q21. जलियाँवाला बाग में गोली चलाने का आदेश किसने दिया था?
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Q22. खिलाफत समिति का गठन कहाँ और कब हुआ?
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Q23. स्वराज पार्टी के संस्थापक कौन थे?
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Q24. बारदोली सत्याग्रह (1928) का नेतृत्व किसने किया?
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Q25. 1921 में अवध में 'नाई-धोबी बंद' आंदोलन किसके द्वारा चलाया गया?
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Q26. 'अवध किसान सभा' का गठन (1920) किनके नेतृत्व में हुआ?
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Q27. 'इनलैंड इमिग्रेशन एक्ट' (Inland Emigration Act) कब पारित हुआ?
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Q28. साइमन कमीशन में कुल कितने सदस्य थे?
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Q29. लाला लाजपत राय की मृत्यु किस घटना के दौरान हुई?
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Q30. दांडी मार्च (नमक यात्रा) की कुल दूरी कितनी थी?
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Q31. कांग्रेस ने किस गोलमेज सम्मेलन (Round Table Conference) में भाग लिया था?
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Q32. 1930 में मुस्लिम लीग के अध्यक्ष कौन थे?
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Q33. 'आनंदमठ' उपन्यास की रचना किसने की?
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Q34. भारत माता को 'संन्यासिनी' के रूप में किसने चित्रित किया?
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Q35. 'द फोकलोर्स ऑफ सदर्न इंडिया' (The Folklore of Southern India) नामक लोककथाओं का संकलन किसने किया?
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Q36. 1921 में गांधीजी द्वारा डिजाइन किए गए 'स्वराज ध्वज' का रंग क्या था?
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Q37. 26 जनवरी 1930 को किस रूप में मनाया गया?
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Q38. "इंकलाब जिंदाबाद" का नारा किसने दिया?
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Q39. अल्लूरी सीताराम राजू का दावा क्या था?
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Q40. असहयोग आंदोलन के दौरान विदेशी कपड़ों का आयात 102 करोड़ से घटकर कितना रह गया?
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Q41. 'हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी' (HSRA) की स्थापना (1928) कहाँ हुई?
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Q42. गांधीजी ने किस गोलमेज सम्मेलन में निराश होकर कहा कि "मैं खाली हाथ लौटा हूँ"?
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Q43. 1917 में गुजरात के खेड़ा जिले में सत्याग्रह क्यों किया गया?
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Q44. लाहौर अधिवेशन (1929) की अध्यक्षता किसने की थी?
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Q45. चौरी-चौरा वर्तमान में किस राज्य में स्थित है?
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Q46. फिक्की (FICCI) के प्रमुख नेता कौन थे?
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Q47. 'हरिजन' (भगवान के बच्चे) शब्द का प्रयोग अछूतों के लिए किसने किया?
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Q48. सविनय अवज्ञा आंदोलन कब वापस लिया गया (पहला चरण)?
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Q49. स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान 'नमक' को प्रतिरोध का प्रतीक किसने बनाया?
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Q50. जलियाँवाला बाग में लोग क्यों जमा हुए थे?
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Q51. 1918 में महात्मा गांधी ने सूती कपड़ा कारखानों के मजदूरों के लिए सत्याग्रह कहाँ किया?
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Q52. 'रॉलेट एक्ट' का मुख्य उद्देश्य क्या था?
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Q53. गांधीजी ने दांडी में नमक कानून कब तोड़ा?
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Q54. 1928 में साइमन कमीशन का विरोध करते समय पुलिस की लाठियों से कौन शहीद हुए?
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Q55. 'बेगार' (Begar) का क्या अर्थ है?
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Q56. बंगाल में 'स्वदेशी आंदोलन' के दौरान जो तिरंगा झंडा बनाया गया था, उसमें कौन से रंग थे?
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Q57. अवध के किसानों की मुख्य मांग क्या थी?
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Q58. डॉ. अंबेडकर और गांधीजी के बीच 'पूना पैक्ट' (1932) का क्या परिणाम हुआ?
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Q59. "सत्याग्रह शारीरिक बल नहीं है... यह आत्मा का बल है।" यह कथन किसका है?
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Q60. प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारत में कौन सी नई कर व्यवस्था शुरू की गई?
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Q61. सविनय अवज्ञा आंदोलन में महिलाओं ने क्या किया?
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Q62. 'भारत माता' की छवि किसके प्रति श्रद्धा का प्रतीक बन गई?
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Q63. गांधीजी ने असहयोग आंदोलन को 'प्रशिक्षण का चरण' क्यों माना?
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Q64. निम्नलिखित में से किसने 'स्वराज पार्टी' का गठन किया?
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Q65. अल्लूरी सीताराम राजू को कब फांसी दी गई?
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Q66. 1920 के दशक में भारत में कृषि उत्पादों की कीमतें गिरने का क्या प्रभाव पड़ा?
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Q67. गांधीजी के साथ दांडी मार्च में कितने विश्वसनीय स्वयंसेवक (Volunteers) थे?
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Q68. सविनय अवज्ञा आंदोलन में औद्योगिक मजदूर वर्ग (Industrial Workers) ने कहाँ हिस्सा लिया?
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Q69. 'पिकेटिंग' (Picketing) का क्या अर्थ है?
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Q70. कांग्रेस ने किस अधिवेशन में 'असहयोग कार्यक्रम' (Non-Cooperation Program) पर मुहर लगाई?
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Q71. जलियाँवाला बाग हत्याकांड के विरोध में किसने अपनी 'नाइटहुड' (Knighthood) की उपाधि लौटा दी?
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Q72. 'सनातनियों' से गांधीजी का क्या तात्पर्य था?
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Q73. 1928 में बारदोली सत्याग्रह क्यों हुआ?
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Q74. कौन सा एक्ट 'काला कानून' (Black Act) के नाम से जाना गया?
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Q75. गांधीजी ने किस गोलमेज सम्मेलन का बहिष्कार (Boycott) किया था?
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Q76. गांधीजी के राजनीतिक गुरु कौन थे?
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Q77. 'वंदे मातरम्' गीत किस उपन्यास से लिया गया है?
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Q78. 1905 में बंगाल में बने 'स्वदेशी झंडे' में कितने कमल के फूल थे?
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Q79. बाबा रामचंद्र किसान नेता बनने से पहले क्या थे?
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Q80. सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान 'धरासना साल्ट वर्क्स' (Dharasana Salt Works) पर रेड का नेतृत्व किसने किया?
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Q81. गांधीजी के 'स्वराज ध्वज' के बीच में चरखा किसका प्रतीक था?
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Q82. 31 दिसंबर 1929 की मध्यरात्रि को किस नदी के तट पर जवाहरलाल नेहरू ने तिरंगा फहराया?
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Q83. "साइमन वापस जाओ" (Simon Go Back) के नारे किसने लगाए?
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Q84. 1930 में 'दलित वर्ग एसोसिएशन' (Depressed Classes Association) की स्थापना किसने की?
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Q85. सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान किस स्थान के लोगों ने वन कानूनों का उल्लंघन किया?
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Q86. किस घटना ने महात्मा गांधी को 1922 में असहयोग आंदोलन रोकने पर मजबूर किया?
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Q87. 1916 में 'लखनऊ समझौता' (Lucknow Pact) किनके बीच हुआ?
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Q88. 'सविनय अवज्ञा' (Civil Disobedience) का शाब्दिक अर्थ क्या है?
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Q89. 1859 के 'इनलैंड इमिग्रेशन एक्ट' से कौन सबसे ज्यादा प्रभावित थे?
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Q90. चंपारण सत्याग्रह (1917) में गांधीजी ने किस फसल की खेती के विरुद्ध आवाज उठाई?
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Q91. जलियाँवाला बाग हत्याकांड किस त्योहार के दिन हुआ था?
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Q92. किसने स्वीकार किया कि जलियाँवाला बाग में गोली चलाने का उद्देश्य "नैतिक प्रभाव" (Moral Effect) पैदा करना था?
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Q93. गांधीजी ने साबरमती आश्रम से दांडी तक की यात्रा कितने दिनों में पूरी की?
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Q94. सविनय अवज्ञा आंदोलन को अंततः पूरी तरह से कब वापस लिया गया?
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Q95. 1930 के दशक में 'समाजवादी' (Socialist) विचारों से कांग्रेस के कौन से नेता सबसे अधिक प्रभावित थे?
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Q96. स्वदेशी आंदोलन (1905) के झंडे में 'अर्धचंद्र' (Crescent Moon) क्या दर्शाता था?
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Q97. 'गिरमिटिया मजदूर' (Indentured Labour) कौन थे?
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Q98. मद्रास में 'नटेसा शास्त्री' ने तमिल लोककथाओं का संग्रह किस नाम से प्रकाशित किया?
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Q99. 1927 में भारतीय व्यापारियों ने कौन सा संगठन बनाया?
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Q100. भारत में राष्ट्रवाद के उदय का मुख्य कारण क्या था?
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🎉 Congratulations! 🎉
आपने History Chapter 2: भारत में राष्ट्रवाद के सभी 100 VVI Questions पूरे कर लिए हैं।
अगर आपने इसे अच्छे से पढ़ा है, तो बोर्ड एग्जाम में इस चैप्टर से एक भी नंबर नहीं कटेगा।

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